मानसतीर्थ-शौचप्रशंसा | Praise of the ‘Mental Tīrtha’ and the Marks of Purity
संख्यामतिगुणां चापि तेषु लोकेषु मोदते । उन सभी स्थानोंमें सफलमनोरथ होकर वह देवकन्याओंद्वारा पूजित होता है तथा जिस यज्ञमें बहुत-से सुवर्णकी दक्षिणा दी जाती है
saṅkhyām atiguṇāṁ cāpi teṣu lokeṣu modate |
भीष्म कहते हैं—वह उन लोकों में गणना से भी अधिक आनन्द भोगता है। उसके सब मनोरथ सिद्ध होते हैं, देवकन्याएँ उसकी पूजा करती हैं; जिस यज्ञ में बहुत-सा सुवर्ण दक्षिणा दी जाती है, उसका फल भी वह प्राप्त कर लेता है और असंख्य वर्षों तक उन लोकों में सुख भोगता है।
भीष्म उवाच