Śama-prāptiḥ — Gautamī–Lubdhaka–Pannaga–Mṛtyu–Kāla-saṃvāda
Restraint through the Analysis of Karma and Time
लुब्धक उवाच कारणं यदि न स्याद् वै न कर्ता स्यास्त्वमप्युत । विनाशकारणं त्वं च तस्माद् वध्योडसि मे मतः
व्याध ने कहा—सर्प! मान भी लें कि तू न अपराध का कारण है, न कर्ता; फिर भी इस बालक का विनाश तेरे ही कारण हुआ है। इसलिए मैं तुझे वध के योग्य मानता हूँ।
लुब्धक उवाच