Ādi-parva Adhyāya 97: Satyavatī’s appeal and Bhīṣma’s reaffirmation of satya
अत--#कत षण्णवतितमोब< ध्याय: महाभिषको ब्रह्माजीका शाप तथा शापग्रस्त वसु ओंके साथ गंगाकी बातचीत वैशम्पायन उवाच इक्ष्वाकुवंशप्रभवो राजा55सीत् पृथिवीपति: । महाभिष इति ख्यातः सत्यवाक् सत्यविक्रम:,वैशम्पायनजी कहते हैं-जनमेजय! इश्वाकु-वंशमें उत्पन्न महाभिष नामसे प्रसिद्ध एक राजा हो गये हैं, जो सत्यवादी होनेके साथ ही सत्यपराक्रमी भी थे। उन्होंने एक हजार अश्वमेध और एक सौ राजसूय यज्ञोंद्वारा देवेश्वर इन्द्रको संतुष्ट किया और उन यज्ञोंके पुण्यसे उन शक्तिशाली नरेशने स्वर्गलोग प्राप्त कर लिया
vaiśampāyana uvāca | ikṣvākuvaṃśaprabhavo rājā āsīt pṛthivīpatiḥ | mahābhiṣa iti khyātaḥ satyavāk satyavikramaḥ |
वैशम्पायन बोले—इक्ष्वाकुवंश में उत्पन्न एक पृथिवीपति राजा हुए, जो महाभिष नाम से प्रसिद्ध थे; वे सत्यवादी और सत्यपराक्रमी थे।
वैशम्पायन उवाच