अहं हि पूर्वो वयसा भवदभ्य- स्तेनाभिवादं भवतां न प्रयुञ्जे । यो विद्यया तपसा जन्मना वा वृद्ध: स पूज्यो भवति द्विजानाम्,मैं आपलोगोंसे अवस्थामें बड़ा हूँ, अतः आपलोगोंको प्रणाम नहीं कर रहा हूँ। द्विजातियोंमें जो विद्या, तप और अवस्थामें बड़ा होता है, वह पूजनीय माना जाता है
मैं आप लोगों से आयु में बड़ा हूँ, इसलिए आप लोगों को प्रणाम नहीं करता। द्विजों में जो विद्या, तप या जन्म से श्रेष्ठ और वृद्ध होता है, वही पूजनीय माना जाता है।
अट्क उवाच