Ādi Parva, Adhyāya 90 — Pūror Vaṃśa, Kuru-Pravara, and the Janamejaya Line
Genealogical Recitation
अनित्यतां सुखदु:खस्य बुद्ध्वा कस्मात् संतापमष्टकाहं भजेयम् | कि कुर्या वै कि च कृत्वा न तप्ये तस्मात् संतापं वर्जयाम्यप्रमत्त:,अष्टक! मैं सुख तथा दुःख दोनोंकी अनित्यताको जानता हूँ, फिर मुझे संताप हो तो कैसे? मैं क्या करूँ: और क्या करके संतप्त न होऊँ, इन बातोंकी चिन्ता छोड़ चुका हूँ। अतः सावधान रहकर शोक-संतापको अपनेसे दूर रखता हूँ
anityatāṁ sukha-duḥkhasya buddhvā kasmāt santāpam aṣṭakāhaṁ bhajeyam | ki kuryā vai ki ca kṛtvā na tapye tasmāt santāpaṁ varjayāmy apramattaḥ |
अष्टक! सुख और दुःख—दोनों की अनित्यता को जानकर मुझे संताप कैसे हो सकता है? मैं क्या करूँ, और क्या करके ऐसा हो कि संतप्त न होऊँ—इन विचारों की चिंता मैंने छोड़ दी है। इसलिए सावधान रहकर मैं शोक-संताप को अपने से दूर रखता हूँ।
जटद्टक उवाच