ययाति–दौहित्रसंवादः
Yayāti and the Grandsons: Discourse on Lokas, Dāna, and Satya
तस्मात् सान्त्वं सदा वाच्यं न वाच्यं परुषं क्वचित् | पूज्यान् सम्पूजयेद् दद्यान्न च याचेत् कदाचन,इसलिये कभी कठोर वचन न बोले। सदा सान्त्वनापूर्ण मधुर वचन ही बोले। पूजनीय पुरुषोंका पूजन (आदर-सत्कार) करे। दूसरोंको दान दे और स्वयं कभी किसीसे कुछ न माँगे
tasmāt sāntvaṃ sadā vācyaṃ na vācyaṃ paruṣaṃ kvacit | pūjyān sampūjayed dadyān na ca yācet kadācana ||
इसलिए सदा सान्त्वना देने वाले मधुर वचन बोलने चाहिए और कभी भी कठोर वाणी नहीं बोलनी चाहिए। जो पूज्य हों उनका यथोचित सत्कार करे, दूसरों को दान दे, और स्वयं कभी किसी से कुछ न माँगे।
शक्र उवाच