ययाति–दौहित्रसंवादः
Yayāti and the Grandsons: Discourse on Lokas, Dāna, and Satya
सद्धिः पुरस्तादभिपूजित: स्यात् सद्धिस्तथा पृष्ठतो रक्षित: स्यात् सदासतामतिवादांस्तितिक्षेत् सतां वृत्तं चाददीतार्यवृत्त:,(अपना बर्ताव और व्यवहार ऐसा रखे, जिससे) साधु पुरुष सामने तो सत्कार करें ही, पीठ-पीछे भी उनके द्वारा अपनी रक्षा हो। दुष्ट लोगोंकी कही हुई अनुचित बातें सदा सह लेनी चाहिये तथा श्रेष्ठ पुरुषोंके सदाचारका आश्रय लेकर साधु पुरुषोंके व्यवहारको ही अपनाना चाहिये
sadbhiḥ purastād abhipūjitaḥ syāt sadbhis tathā pṛṣṭhato rakṣitaḥ syāt | sadā satām ativādāṁs titikṣet satāṁ vṛttaṁ cādadītāryavṛttaḥ ||
इन्द्र ने कहा—मनुष्य ऐसा आचरण रखे कि सज्जन सामने तो उसका सत्कार करें ही, पीठ पीछे भी उसकी रक्षा करें। दुष्टों की अनुचित और कटु बातें सदा सह ले, और श्रेष्ठ जनों के सदाचार का आश्रय लेकर उन्हीं के आचरण को अपनाए।
शक्र उवाच