Ādi Parva, Adhyāya 85: Āṣṭaka–Yayāti संवादः
Merit-Exhaustion, Rebirth, and the Critique of Pride
यत्राश्वरथमुख्यानामश्चानां स्थाद् गतं न च | हस्तिनां पीठकानां च गर्दभानां तथैव च,ययातिरुवाच अनो त्व॑ं प्रतिपद्यस्व पाप्मानं जरया सह । एकं वर्षसहसत्रं तु चरेयं यौवनेन ते तदनन्तर ययातिने [अनुसे] कहा--अनो! तुम बुढ़ापेके साथ मेरा दोष ले लो और मैं तुम्हारी जवानीके द्वारा एक हजार वर्षतक सुख भोगूँगा
yatrāśvarathamukhyānām aśvānāṃ sthād gataṃ na ca | hastināṃ pīṭhakānāṃ ca gardabhānāṃ tathaiva ca || yayātir uvāca: ano tvaṃ pratipadyasva pāpmānaṃ jarayā saha | ekaṃ varṣasahasraṃ tu careyaṃ yauvanena te ||
वैशम्पायन बोले—जहाँ श्रेष्ठ घोड़े और रथ न तो ठहर सकें, न चल सकें; हाथी, पीठक (भारवाहक) और गधे भी वैसे ही असमर्थ हों। तब ययाति ने कहा—हे अनो! मेरे पाप का भार बुढ़ापे सहित तुम ले लो; और मैं तुम्हारी जवानी से एक हजार वर्ष तक सुख भोगूँगा।
वैशम्पायन उवाच