ययाति–शक्रसंवादः
Speech-Ethics and Forbearance in the Celestial Court
देवयानी प्रजातासौ वृथाहं प्राप्तयौवना । यथा तया वृतो भर्ता तथैवाहं वृणोमि तम्,“देवयानी तो पुत्रवती हो गयी; किंतु मुझे जो जवानी मिली है, वह व्यर्थ जा रही है। जिस प्रकार उसने पतिका वरण किया है, उसी तरह मैं भी उन्हीं महाराजका क्यों न पतिके रूपमें वरण कर लूँ
devayānī prajātāsau vṛthāhaṃ prāptayauvanā | yathā tayā vṛto bhartā tathaivāhaṃ vṛṇomi tam ||
देवयानी तो पुत्रवती हो गई; पर मेरी प्राप्त हुई जवानी व्यर्थ जा रही है। जिस प्रकार उसने पति का वरण किया, उसी प्रकार मैं भी उसी राजा को पति रूप में चुनती हूँ।
वैशम्पायन उवाच