ययाति–देवयानी संवादः
Yayāti–Devayānī Dialogue and Śukra’s Consent
शुक्रे तामाहर क्षिप्रं भागभाड़ नो भविष्यसि । वृषपर्वसमीपे हि शकयो द्रष्टूं त्वया द्विज:,“ब्रह्म! हम आपके सेवक हैं। आप हमें अपनाइये और हमारी उत्तम सहायता कीजिये। अमिततेजस्वी ब्राह्मण शुक्राचार्यके पास जो मृतसंजीवनी विद्या है, उसे शीघ्र सीखकर यहाँ ले आइये। इससे आप हम देवताओंके साथ यज्ञमें भाग प्राप्त कर सकेंगे। राजा वृषपर्वाके समीप आपको विप्रवर शुक्राचार्यका दर्शन हो सकता है”
śukre tām āhara kṣipraṃ bhāgabhāḍ no bhaviṣyasi | vṛṣaparvasamīpe hi śakyo draṣṭuṃ tvayā dvija ||
“शुक्राचार्य से वह (विद्या) शीघ्र ले आइए; तब आप हमारे यज्ञभाग के अधिकारी हो जाएँगे। हे द्विज! राजा वृषपर्वा के समीप आप निश्चय ही (शुक्राचार्य का) दर्शन कर सकेंगे।”
वैशम्पायन उवाच