Śukra’s Ultimatum and Devayānī’s Demand (शुक्र-प्रतिज्ञा तथा देवयानी-वर-याचना)
ययातिरपि पत्नीभ्यां दीर्घकालं विहृत्य च | विश्वाच्या सहितो रेमे पुनश्चैत्ररथे वने,उन्होंने अपनी दोनों पत्नियोंके साथ दीर्घकालतक विहार करके चैत्ररथ वनमें जाकर विश्वाची अप्सराके साथ रमण किया
yayātir api patnībhyāṁ dīrghakālaṁ vihṛtya ca | viśvācyā sahito reme punaś caitrarathe vane ||
वैशम्पायन बोले— ययाति ने अपनी दोनों पत्नियों के साथ दीर्घकाल तक विहार किया; फिर वे पुनः चैत्ररथ वन में गए और वहाँ अप्सरा विश्वाची के साथ रमण करने लगे।
वैशम्पायन उवाच