Mahabharata Adhyaya 70
Adi ParvaAdhyaya 7052 Verses

Adhyaya 70

वंशानुकीर्तनम् — Genealogical Recitation from Dakṣa to Yayāti and the Establishment of the Paurava Line

Upa-parva: Vaṃśānucarita (Genealogical Prelude: Dakṣa–Manu–Yayāti–Pūru Lineage)

Vaiśaṃpāyana announces to Janamejaya a systematic recitation of lineages: the descent from the Pracetases to Dakṣa, Dakṣa’s progeny, and the distribution of Dakṣa’s daughters to Dharma, Kaśyapa, Kāla, and Soma (Indu). From Kaśyapa and Dākṣāyaṇī arise the Ādityas, including Vivasvān; from Vivasvān comes Yama; and from Martāṇḍa arises Manu Vaivasvata, from whom human lineages proliferate. The chapter then enumerates Manu’s sons and notes internecine dissension leading to extinction of many lines. Purūravas appears with exceptional status and later moral decline: conflict with brāhmaṇas, refusal to return appropriated valuables, and a resulting curse and downfall. The narrative proceeds through Āyu and his descendants, presenting Nahūṣa’s rule and overreach, followed by Yayāti’s prosperous reign. A key ethical-political episode follows: afflicted by premature old age due to a curse, Yayāti requests his sons to exchange their youth for his old age. The elder sons refuse; the youngest, Pūru, accepts, thereby securing royal succession. Yayāti later acknowledges the insufficiency of desire (kāma) even after extended enjoyment, installs Pūru as king, and withdraws in accordance with time-bound duty.

Chapter Arc: मृगया के उन्माद में सहस्रों मृगों का वध कर, महाराज दुष्यन्त अपने बल और पराक्रम के साथ वन की ओर बढ़ते हैं—पर शीघ्र ही वे अकेले, क्षुधा-पिपासा से पीड़ित, एक अनजानी शून्यता में आ खड़े होते हैं। → ऊसर, वृक्षशून्य प्रदेश को पार कर राजा एक दूसरे विशाल, मनोहर वन में प्रवेश करते हैं जहाँ शीतल, सुगन्धित पवन पुष्प-रेणु बिखेरता है। प्रकृति का यह सौन्दर्य उन्हें मोह लेता है और आगे खींचता है—मानो कोई अदृश्य संकेत उन्हें किसी नियति-स्थल की ओर ले जा रहा हो। → वन के तट पर कश्यप-गोत्रीय महात्मा कण्व का रमणीय, तपस्या-रक्षित आश्रम प्रकट होता है—यज्ञविद्या, यजुर्वेद-ज्ञान और मधुर सामगान से शोभित, ऋषिगणों से सेवित। राजा मंत्रिमण्डल और पुरोहित सहित उस ‘उत्तमाश्रम’ में प्रवेश करते हैं और उसकी दिव्यता देखकर तृप्त नहीं होते। → अध्याय का समापन आश्रम के गुण-वैभव और पवित्र वातावरण के स्थापन से होता है—यह स्पष्ट कर दिया जाता है कि दुष्यन्त का आगमन किसी साधारण वन-भ्रमण का परिणाम नहीं, बल्कि एक धर्म-नियोजित कथा-द्वार है। → कण्वाश्रम में प्रवेश के साथ प्रश्न खुला रह जाता है—इस तपोवन में राजा को कौन-सा साक्षात्कार होने वाला है, और यह सौन्दर्य-शान्ति किस आगामी उलटफेर की भूमिका है?

Shlokas

Verse 1

अपन का छा | अफड-ए क्र सप्ततितमो< ध्याय: तपोवन और कण्वके आश्रमका वर्णन तथा राजा दुष्पन्तका उस आश्रममें प्रवेश वैशम्पायन उवाच ततो मृगसहस्राणि हत्वा सबलवाहन: । राजा मृगप्रसड्रेन वनमन्यद्‌ विवेश ह

वैशम्पायन बोले—तदनन्तर राजा दुष्यन्त सेना और सवारियों सहित सहस्रों वन्य पशुओं का वध करके, शिकार के वेग में एक ही मृग का पीछा करते हुए दूसरे वन में प्रवेश कर गया।

Verse 2

एक एवोत्तमबल: क्षुत्पिपासाश्रमान्वित: । स वनस्यान्तमासाद्य महच्छून्यं समासदत्‌

उत्तम बल से युक्त होकर भी भूख, प्यास और थकावट से पीड़ित राजा दुष्यन्त उस समय अकेले थे। वन के छोर पर पहुँचकर उन्होंने एक बहुत बड़ा सूना, ऊसर मैदान देखा, जहाँ वृक्ष आदि न थे।

Verse 3

तच्चाप्यतीत्य नृपतिरुत्तमाश्रमसंयुतम्‌ । मन: प्रह्लादजननं दृष्टिकान्तमतीव च

उस क्षेत्र को भी पार करके नृपति एक ऐसे महान् वन में पहुँचे जो उत्तम आश्रमों से युक्त था। वह देखने में अत्यन्त रमणीय था और उसके दर्शन मात्र से मन में अपूर्व हर्ष उत्पन्न होता था।

Verse 4

शीतमारुतसंयुक्तं जगामान्यन्महद्‌ वनम्‌ । पुष्पितै: पादपै: कीर्णमतीव सुखशाद्धलम्‌

शीतल समीर से युक्त वह आगे बढ़कर दूसरे महान् वन में गया, जो पुष्पित वृक्षों से आच्छादित था और अत्यन्त सुखद, कोमल हरित तृण से भरा हुआ था।

Verse 5

विपुलं मधुरारावैर्नादितं विहगैस्तथा । पुंस्कोकिलनिनादैश्व झिललीकगणनादितम्‌

वह वन विशाल था और मधुर स्वर वाले विविध पक्षियों के कलरव से गूँज रहा था। कहीं नर कोकिलों की कूक सुनाई देती थी और कहीं झींगुरों के समूहों की सूक्ष्म झंकार।

Verse 6

प्रवृद्धविटपैर्वृक्षै: सुखच्छायै: समावृतम्‌ । षट्पदाघ॒ूर्णिततलं लक्ष्म्या परमया युतम्‌

वहाँ सब ओर बड़ी-बड़ी शाखाओंवाले विशाल वृक्ष अपनी सुखद शीतल छाया किये हुए थे और उन वृक्षों के नीचे सब ओर भ्रमर मँडरा रहे थे। इस प्रकार वहाँ सर्वत्र बड़ी भारी शोभा छा रही थी।

Verse 7

नापुष्प: पादप: वक्रिन्नाफलो नापि कण्टकी । षट्पदैर्नाप्पपाकीर्णस्तस्मिन्‌ वै कानने5भवत्‌

उस वन में एक भी वृक्ष ऐसा नहीं था, जिसमें फूल और फल न लगे हों तथा भौरे न बैठे हों। काँटेदार वृक्ष तो वहाँ ढूँढ़ने पर भी नहीं मिलता था।

Verse 8

विहगैनदितं पुष्पैरलंकृतमतीव च । सर्वर्तुकुसुमैर्वक्षै: सुखच्छायै: समावृतम्‌

सब ओर अनेकानेक पक्षी चहक रहे थे। भाँति-भाँति के पुष्प उस वन की अत्यन्त शोभा बढ़ा रहे थे। सभी ऋतुओं में फूल देनेवाले सुखद छायायुक्त वृक्ष वहाँ चारों ओर फैले हुए थे।

Verse 9

मनोरमं महेष्वासो विवेश वनमुत्तमम्‌ । मारुताकलितास्तत्र द्रुमा: कुसुमशाखिन:

महान धनुर्धर उस अत्युत्तम, मनोहर वन में प्रविष्ट हुआ। वहाँ पवन के स्पर्श से पुष्पित शाखाओंवाले वृक्ष लहराते थे।

Verse 10

पुष्पवृष्टिं विचित्रां तु व्यसृजंस्ते पुन: पुनः । दिवःस्पृशो5थ संघुष्टा: पक्षिभिर्मधुरस्वनै:

वे बार-बार विचित्र पुष्पवृष्टि करने लगे। तब आकाश को छूते हुए प्रदेश मधुर स्वरवाले पक्षियों के कलरव से गूँज उठे।

Verse 11

महान्‌ धनुर्थर राजा दुष्यन्तने इस प्रकार मनको मोह लेनेवाले उस उत्तम वनमें प्रवेश किया। उस समय फूलोंसे भरी हुई डालियोंवाले वृक्ष वायुके झकोरोंसे हिल-हिलकर उनके ऊपर बार-बार अदभुत पुष्प-वर्षा करने लगे। वे वृक्ष इतने ऊँचे थे

वैशम्पायन बोले—महान धनुर्धर, प्रतापी राजा दुष्यन्त उस उत्तम वन में प्रविष्ट हुए, जो मन को मोहित कर लेता है। तब पुष्पों से लदी डालियों वाले वृक्ष वायु के झोंकों से डोलते हुए बार-बार उनके ऊपर अद्भुत पुष्प-वर्षा करने लगे। वे वृक्ष इतने ऊँचे थे मानो आकाश को छू लेंगे। उन पर बैठे मधुर-भाषी पक्षियों के मीठे स्वर उस उपवन में गूँज उठे। वहाँ वृक्ष मानो नाना रंगों के पुष्प-वस्त्र धारण किए हुए शोभायमान थे। पुष्प-भार से झुकी कोमल कोंपलों पर मधु-लोलुप भ्रमर मधुर गुंजार कर रहे थे। राजा दुष्यन्त ने वहाँ अनेक रमणीय स्थल देखे, जो पुष्प-ढेरों से सुशोभित और लता-मण्डपों से अलंकृत थे; उन मनोहर प्रदेशों को देखकर, जो हृदय की प्रसन्नता बढ़ाते हैं, महातेजस्वी राजा उस समय अत्यन्त हर्षित हो उठे।

Verse 12

रुवन्ति रावान्‌ मधुरान्‌ षट्पदा मधुलिप्सव: । तत्र प्रदेशांश्व बहून्‌ कुसुमोत्करमण्डितान्‌

वैशम्पायन बोले—वहाँ मधु-लोलुप भ्रमर मधुर गुंजार कर रहे थे। उस वन में राजा ने अनेक रमणीय प्रदेश देखे, जो पुष्प-ढेरों से सुशोभित और लताओं के पुष्प-प्रसार से अलंकृत थे। मन की प्रसन्नता बढ़ाने वाले उन मनोहर स्थलों को देखकर महातेजस्वी राजा दुष्यन्त उस समय अत्यन्त आनंदित हो उठे।

Verse 13

लतागृहपरिक्षिप्तान्‌ मनस: प्रीतिवर्धनान्‌ । सम्पश्यन्‌ सुमहातेजा बभूव मुदितस्तदा

वैशम्पायन बोले—लता-गृहों (लता-मण्डपों) से घिरे, मन की प्रीति बढ़ाने वाले उन रमणीय प्रदेशों को देखते हुए महातेजस्वी राजा दुष्यन्त उस समय प्रसन्न हो उठे।

Verse 14

परस्पराश्लिष्टशाखै: पादपै: कुसुमान्वितै: । अशोभत वन तत्‌ तु महेन्द्रध्वजसंनिभै:

वैशम्पायन बोले—फूलों से युक्त वृक्ष, अपनी शाखाएँ परस्पर सटाकर मानो आलिंगन किए हुए, उस वन की शोभा बढ़ा रहे थे। वे गगनचुम्बी वृक्ष महेन्द्र के ध्वज के समान प्रतीत होते थे, और उनके कारण उस वन में राजसी वैभव-सी छटा छा गई थी।

Verse 15

सिद्धचारणसंघैश्न गन्धर्वाप्सरसां गणै: । सेवितं वनमत्यर्थ मत्तवानरकिन्नरम्‌,सिद्ध-चारणसमुदाय तथा गन्धर्व और अप्सराओंके समूह भी उस वनका अत्यन्त सेवन करते थे। वहाँ मतवाले वानर और किन्नर निवास करते थे

वैशम्पायन बोले—उस वन का सिद्ध-चारणों के समुदाय तथा गन्धर्वों और अप्सराओं के गण अत्यन्त सेवन करते थे। वहाँ मतवाले वानर और किन्नर भी निवास करते थे; इस प्रकार वह वन मानो दिव्य और पावन लोक का ही अंश प्रतीत होता था।

Verse 16

सुख: शीत: सुगन्धी च पुष्परेणुवहो5निल: । परिक्रामन्‌ वने वृक्षानुपैतीव रिरंसया,उस वनमें शीतल, सुगन्ध, सुखदायिनी मन्द वायु फ़ूलोंके पराग वहन करती हुई मानो रमणकी इच्छासे बार-बार वृक्षोंक समीप आती थी

उस वन में शीतल, सुगन्धित और सुखद मन्द वायु पुष्पों का पराग वहन करती हुई मानो रमण की इच्छा से बार-बार वृक्षों के समीप आती और वन में विचरती थी।

Verse 17

एवंगुणसमायुक्तं ददर्श स वन॑ नृप: । नदीकच्छोद्धवं कान्तमुच्छितध्वजसंनिभम्‌

राजा ने उस वन को देखा जो ऐसे उत्तम गुणों से युक्त था—मालिनी नदी के कछार में फैला हुआ, और ऊँचे ध्वजों के समान उन्नत वृक्षों से परिपूर्ण होने के कारण अत्यन्त मनोहर प्रतीत होता था।

Verse 18

प्रेक्षमाणो वन॑ तत्‌ तु सुप्रहृष्टविहड्रमम्‌ । आश्रमप्रवरं रम्यं ददर्श च मनोरमम्‌

राजा उस वन की शोभा देख ही रहे थे—जहाँ पक्षी अत्यन्त हर्ष से कलरव कर रहे थे—कि उनकी दृष्टि एक श्रेष्ठ आश्रम पर पड़ी, जो अत्यन्त रमणीय और मनोहर था।

Verse 19

नानावृक्षसमाकीर्ण सम्प्रज्वलितपावकम्‌ । त॑ तदाप्रतिमं श्रीमानाश्रमं प्रत्यपूजयत्‌

नाना प्रकार के वृक्षों से परिपूर्ण उस आश्रम में स्थान-स्थान पर पावक (अग्नि) प्रज्वलित थे। उस समय उस अनुपम आश्रम को देखकर श्रीमान् राजा दुष्यन्त ने मन-ही-मन उसका बड़ा सम्मान किया।

Verse 20

यतिभिर्वालखिल्यैश्न वृतं मुनिगणान्वितम्‌ । अग्न्यगारैश्न बहुभि: पुष्पसंस्तरसंस्तृतम्‌

वह आश्रम त्यागी-विरागी यतियों, बालखिल्य ऋषियों तथा अन्य मुनिगणों से घिरा हुआ था। अनेक अग्निहोत्र-गृहों से वह सुशोभित था, और भूमि पर इतने पुष्प बिखरे थे कि मानो फूलों का संस्तर (बिछौना) बिछा हो।

Verse 21

महाकच्छैर्बृहद्धिश्व विभ्राजितमतीव च । मालिनीमभितो राजन्‌ नदीं पुण्यां सुखोदकाम्‌

वैशम्पायन बोले—राजन्! बड़े-बड़े झुरमुटों और ऊँचे वृक्षों से वह आश्रम अत्यन्त शोभायमान था। उसके बीचों-बीच पुण्यसलिला मालिनी नदी बहती थी, जिसका जल शीतल, सुखद और मधुर था; और उसके दोनों तटों पर वह आश्रम फैला हुआ था।

Verse 22

नैकपक्षिगणाकीर्णा तपोवनमनोरमाम्‌ | तत्र व्यालमृगान्‌ सौम्यान्‌ पश्यन्‌ प्रीतिमवाप सः

वह प्रदेश अनेक जलपक्षियों के समूहों से भरा हुआ था और तटवर्ती तपोवनों के कारण उसकी मनोहरता और बढ़ गई थी। वहाँ विषधर सर्प और वन्य पशु भी सौम्य, अहिंसक भाव से रहते थे। यह देखकर राजा को बड़ी प्रसन्नता हुई।

Verse 23

त॑ चाप्रतिरथ: श्रीमानाश्रमं प्रत्यपद्यत । देवलोकप्रतीकाशं सर्वतः सुमनोहरम्‌

वैशम्पायन बोले—श्रीमान अप्रतिरथ वीर उस आश्रम के समीप जा पहुँचे, जो देवताओं के लोक के समान प्रतीत होता था और चारों ओर से अत्यन्त मनोहर था।

Verse 24

नदीं चाश्रमसंश्लिष्टां पुण्यतोयां ददर्श सः । सर्वप्राणभूतां तत्र जननीमिव घिछिताम्‌

उन्होंने आश्रम से सटकर बहने वाली पुण्यतोया नदी को भी देखा, जो वहाँ समस्त प्राणियों की जननी के समान शोभायमान थी।

Verse 25

सचक्रवाकपुलिनां पुष्पफेनप्रवाहिनीम्‌ । सकिन्नरगणावासां वानरफक्षनिषेविताम्‌

उसके तटों पर चकवा-चकई किलोल कर रहे थे। जल में असंख्य पुष्प ऐसे बह रहे थे मानो फेन हो। उसके तटप्रान्त में किन्नरों के निवास-स्थान थे, और वानर तथा रीछ भी उस नदी का सेवन करते थे।

Verse 26

पुण्यस्वाध्यायसंघुष्टां पुलिनैरुपशोभिताम्‌ । मत्तवारणशार्दूलभुजगेन्द्रनिषेविताम्‌

वैशम्पायन बोले—वेद-शास्त्रों के पवित्र स्वाध्याय-ध्वनि से गूँजता हुआ वह तटप्रदेश अनेक सुन्दर पुलिनों से शोभित था। मतवाले हाथी, व्याघ्र और बड़े-बड़े नागराज भी मालिनी के तट का आश्रय लेकर वहाँ विचरते थे—जहाँ पवित्रता, विद्या और वन्य प्रकृति एक साथ समरस दिखाई देती थीं।

Verse 27

तस्यास्तीरे भगवत: काश्यपस्य महात्मन: । आश्रमप्रवरं रम्यं महर्षिगणसेवितम्‌,उसके तटपर ही कश्यपगोत्रीय महात्मा कण्वका वह उत्तम एवं रमणीय आश्रम था। वहाँ महर्षियोंके समुदाय निवास करते थे

उस नदी के तट पर काश्यपगोत्रीय महात्मा, भगवत् कण्व का वह उत्तम और रमणीय आश्रम था, जहाँ महर्षियों के समुदाय निवास करते और सेवा-परायण रहते थे।

Verse 28

नदीमाश्रमसम्बद्धां दृष्टवा55श्रमपदं तथा । चकाराभिप्रवेशाय मतिं स नृपतिस्तदा,उस मनोहर आश्रम और आश्रमसे सटी हुई नदीको देखकर राजाने उस समय उसमें प्रवेश करनेका विचार किया

उस मनोहर आश्रम-स्थान को और आश्रम से लगी हुई नदी को देखकर राजा ने उसी समय वहाँ प्रवेश करने का निश्चय किया।

Verse 29

अलंकृतं द्वीपवत्या मालिन्या रम्यतीरया । नरनारायणस्थानं गड़येवोपशोभितम्‌,टापुओंसे युक्त तथा सुरम्य तटवाली मालिनी नदीसे सुशोभित वह आश्रम गंगा नदीसे शोभायमान भगवान्‌ नर-नारायणके आश्रम-सा जान पड़ता था

टापुओं से युक्त तथा सुरम्य तटवाली मालिनी नदी से सुशोभित वह आश्रम गंगा से शोभायमान भगवान् नर-नारायण के आश्रम-सा प्रतीत होता था।

Verse 30

मत्तबर्हिणसंघुष्ट प्रविवेश महद्‌ वनम्‌ | तत्‌ स चैत्ररथप्रख्यं समुपेत्य नरर्षभ:

वैशम्पायन बोले—मत्त मयूरों के कलरव से गूँजते हुए उस विशाल वन में वह नरश्रेष्ठ प्रविष्ट हुआ। फिर वह पुरुषसिंह चैत्ररथ-वन के समान प्रसिद्ध एक रम्य प्रदेश के निकट जा पहुँचा।

Verse 31

अतीवगुणसम्पन्नमनिर्देश्यं च वर्चसा | महर्षि काश्यपं द्रष्टमथ कण्वं तपोधनम्‌

वैशम्पायन बोले—उसने महर्षि काश्यप को देखा, जो अत्यन्त गुणसम्पन्न थे और जिनका तेज वाणी से अवर्णनीय था; तथा तपस्या-धन के भण्डार महर्षि कण्व को भी देखा।

Verse 32

ध्वजिनीमश्वसम्बाधां पदातिगजसंकुलाम्‌ । अवस्थाप्य वनद्वारि सेनामिदमुवाच स:

वैशम्पायन बोले—ध्वजाओं से युक्त, घोड़ों से घनी, पैदल और गजों से भरी हुई सेना को वन-द्वार पर ठहराकर उसने ये वचन कहे।

Verse 33

तदनन्तर नरश्रेष्ठ दुष्यन्तने अत्यन्त उत्तम गुणोंसे सम्पन्न कश्यपगोत्रीय महर्षि तपोधन कण्वका

तदनन्तर, नरश्रेष्ठ राजा दुष्यन्त उस महान् वन में प्रविष्ट हुए, जो कुबेर के चैत्ररथवन के समान मनोहर था, जहाँ मतवाले मयूर अपनी केकाध्वनि फैला रहे थे। वहीं काश्यप-गोत्र के, परम गुणसम्पन्न, वाणी से अवर्णनीय तेज वाले तपोधन महर्षि कण्व निवास करते थे। वहाँ पहुँचकर नरेश ने रथ, घोड़े, हाथी और पैदल—अपनी चतुरंगिणी सेना को उस तपोवन के किनारे ठहरा दिया और सेनापति से कहा—“मैं रजोरहित तपस्वी, काश्यपपुत्र महर्षि कण्व के दर्शन हेतु आश्रम में जाता हूँ; जब तक मैं लौट न आऊँ, तुम सब यहीं ठहरे रहो।”

Verse 34

तद्‌ वन॑ नन्दनप्रख्यमासाद्य मनुजेश्वर: । क्षुत्पिपासे जहौ राजा मुर्दे चावाप पुष्कलाम्‌

वैशम्पायन बोले—नन्दनवन के समान शोभायमान उस वन-आश्रम में पहुँचकर मनुजेश्वर राजा दुष्यन्त ने भूख-प्यास को त्याग दिया और वहाँ प्रचुर आनन्द प्राप्त किया।

Verse 35

सामात्यो राजलिड्रानि सो5पनीय नराधिप: । पुरोहितसहायश्च जगामाश्रममुत्तमम्‌,वे नरेश मुकुट आदि राजचिह्लोंको हटाकर साधारण वेश-भूषामें मन्त्रियों और पुरोहितके साथ उस उत्तम आश्रमके भीतर गये

वैशम्पायन बोले—नराधिप राजा ने मन्त्रियों सहित राजचिह्नों को उतार दिया; और पुरोहित की सहायता तथा संग से, साधारण वेश में, उस उत्तम आश्रम के भीतर प्रविष्ट हुए।

Verse 36

दिदृक्षुस्तत्र तमृषिं तपोराशिमथाव्ययम्‌ । ब्रह्मलोकप्रतीकाशमाश्रमं सोडभिवीक्ष्य ह । षट्पदोदगीतसंघुष्टं नानाद्धविजगणायुतम्‌

वैशम्पायन बोले— उस अविनाशी तपोनिधि महर्षि के दर्शन की अभिलाषा से राजा ने उस आश्रम को देखा, जो मानो ब्रह्मलोक के समान दीप्तिमान था। वह मधुमक्खियों के गुंजारव से गूँज रहा था और नाना प्रकार के असंख्य पक्षियों के कलरव से परिपूर्ण था—संयमित तपस्या से उपजी पवित्र शान्ति का साक्षात् रूप।

Verse 37

ऋचो बह्नचमुख्यैश्न प्रेयमाणा: पदक्रमैः । शुश्राव मनुजव्याप्रो विततेष्विह कर्मसु

वैशम्पायन बोले— श्रेष्ठ ऋग्वेदी ब्राह्मण पद-पाठ और क्रम-पाठ के विधान से ऋचाओं का उच्चारण कर रहे थे। उन विविध यज्ञकर्मों के विस्तार के बीच मनुष्य-व्याघ्र राजा दुष्यन्त ने उन पवित्र वैदिक मन्त्रों को श्रद्धापूर्वक सुना।

Verse 38

यज्ञविद्याड्भविद्धिश्व यजुर्विद्धिश्चन शोभितम्‌ । मधुरै: सामगीतैश्व ऋषिभिननियतव्रतै:

वैशम्पायन बोले— यज्ञविद्या और उसके अंगों में निपुण यजुर्वेदी विद्वानों से वह आश्रम सुशोभित था। वहीं नियमव्रत धारण करने वाले ऋषि मधुर स्वर में सामगान कर रहे थे, जिससे उस पवित्र स्थान की शोभा और भी बढ़ रही थी।

Verse 39

भारुण्डसामगीताभिरथर्वशिरसोदगतै: । यतात्मभि: सुनियतै: शुशुभे स तदाश्रम:

तब वह आश्रम और भी दीप्त हो उठा—आत्मसंयमी, कठोर नियमों का पालन करने वाले ऋषि भारुण्ड-साम के गीत गा रहे थे और अथर्वशिरस् परम्परा के मन्त्रों का उच्चारण कर रहे थे। उनके व्रत-निष्ठ आचरण और वेदमय स्वर से वह आश्रम तेजस्वी बन गया।

Verse 40

अथर्ववेदप्रवरा: पूगयज्ञियसामगा: । संहितामीरयन्ति सम पदक्रमयुतां तु ते,श्रेष्ठ अथर्ववेदीय विद्वान्‌ तथा पूगयज्ञिय नामक सामके गायक सामवेदी महर्षि पद और क्रमसहित अपनी-अपनी संहिताका पाठ करते थे

तदनन्तर श्रेष्ठ अथर्ववेदी विद्वान् और पूगयज्ञिय नामक सामगायक सामवेदी महर्षि अपनी-अपनी संहिता का समस्वर में पाठ करने लगे। वे पद-पाठ और क्रम-पाठ सहित, मापित और शुद्ध रीति से वेदवाणी का उच्चारण कर रहे थे।

Verse 41

शब्दसंस्कारसंयुक्तिर््रुवद्धिश्चापरैर्द्धिजै: । नादितः स बभौ श्रीमान्‌ ब्रह्मलोक इवापर:

अन्य द्विजबालक भी शब्द-संस्कार से सम्पन्न थे। वे स्थान, करण और प्रयत्न का ध्यान रखते हुए स्थिर, अनुशासित उच्चारण से संस्कृत वाक्यों का पाठ करते थे। उनके समवेत नाद से वह श्रीमान् आश्रम चारों ओर गूँज उठा और मानो दूसरा ब्रह्मलोक-सा शोभित होने लगा।

Verse 42

यज्ञसंस्तरविद्धिश्न क्रमशिक्षाविशारदै: । न्यायतत्त्वात्मविज्ञानसम्पन्नैवेंदपारगै:

यज्ञ-भूमि की व्यवस्था और यथाक्रम शिक्षा में निपुण, न्याय, तत्त्व और आत्म-विद्या से सम्पन्न तथा वेद-पारंगत विद्वानों ने उस यज्ञ का संस्तरण और संचालन किया।

Verse 43

नानावाक्यसमाहारसमवायविशारदै: । विशेषकार्यविद्धिश्न मोक्षधर्मपरायणै:

वे नाना प्रकार के वाक्यों का समाहार और समवाय करने में निपुण थे, विशेष अवसरों में क्या करना चाहिए—इसका निर्णय जानते थे, और मोक्ष-धर्म में परायण थे।

Verse 44

स्थापनाक्षेपसिद्धान्तपरमर्थज्ञतां गतै: । शब्दच्छन्दोनिरुक्तज्ै: कालज्ञानविशारदै:

वे स्थापना और आक्षेप की विधियों में प्रवीण, सिद्धान्त और परम अर्थ के ज्ञाता, शब्द, छन्द और निरुक्त के विशेषज्ञ तथा काल-ज्ञान में अत्यन्त निपुण थे।

Verse 45

द्रव्यकर्मगुणज्ैश्व॒ कार्यकारणवेदिभि: । पक्षिवानररुतज्जैक्ष व्यासग्रन्थसमाश्रितै:

वे द्रव्य, कर्म और गुण के ज्ञाता थे, कार्य-कारण-भाव को समझने वाले थे, पक्षियों और वानरों के रुत (स्वर/संकेत) के जानकार थे, और व्यास के ग्रन्थों का आश्रय लिये हुए विद्वान थे।

Verse 46

नानाशाम्त्रेषु मुख्यैश्न शुश्राव स्वनमीरितम्‌ । लोकायतिकमुख्यैश्न समनन्‍्तादनुनादितम्‌

वैशम्पायन बोले—अनेक प्रधान शास्त्रों में उसने अपना मत कहीं घोषित होता नहीं सुना; पर लोकायत के प्रमुख वादों में वही मत उसे चारों ओर से, मानो अनन्त तक, प्रतिध्वनित होता सुनाई पड़ा।

Verse 47

यज्ञवेदीकी रचनाके ज्ञाता

वहाँ-वहाँ शत्रुवीरों का संहार करने वाले नृपश्रेष्ठ दुष्यन्त ने आश्रम के अनेक स्थानों पर श्रेष्ठ ब्राह्मणों को देखा—नियम में स्थित, इन्द्रिय-निग्रह से युक्त, कठोर व्रतधारी, और जप तथा होम में निरन्तर प्रवृत्त।

Verse 48

आसनानि विचित्राणि रुचिराणि महीपति: । प्रयत्नोपहितानि सम दृष्टवा विस्मयमागमत्‌,वहाँ प्रयत्नपूर्वक तैयार किये हुए बहुत सुन्दर एवं विचित्र आसन देखकर राजाको बड़ा आश्चर्य हुआ

वैशम्पायन बोले—महीपति ने प्रयत्नपूर्वक सजाए गए सुन्दर और विचित्र आसनों को भली-भाँति देखकर बड़ा विस्मय पाया।

Verse 49

देवतायतनानां च प्रेक्ष्य पूजां कृतां द्विजै: । ब्रह्मलोकस्थमात्मानं मेने स नृपसत्तम:,द्विजोंद्वारा की हुई देवालयोंकी पूजा-पद्धति देखकर नृपश्रेष्ठ दुष्यन्तने ऐसा समझा कि मैं ब्रह्मलोकमें आ पहुँचा हूँ

द्विजों द्वारा देवालयों में की गई पूजा-विधि को देखकर उस नृपश्रेष्ठ ने ऐसा माना मानो मैं ब्रह्मलोक में आ पहुँचा हूँ।

Verse 50

स काश्यपतपोगुप्तमाश्रमप्रवरं शुभम्‌ | नातृप्यत्‌ प्रेक्षमाणो वै तपोवनगुणैर्युतम्‌

वैशम्पायन बोले—वह श्रेष्ठ और शुभ आश्रम काश्यप-वंश की तपस्या से सुरक्षित था और तपोवन के उत्तम गुणों से युक्त। उसे देखते हुए राजा का मन तृप्त नहीं होता था।

Verse 51

स काश्यपस्यायतन महाव्रतै- वतं समन्तादृषिभिस्तपो धनै: । विवेश सामात्यपुरोहितो5रिहा विविक्तमत्यर्थमनोहरं शुभम्‌

वैशम्पायनजी बोले—वह काश्यप-सम्बन्धी आश्रम महाव्रतधारी तपोधन महर्षियों से चारों ओर घिरा हुआ था। वह स्थान अत्यन्त एकान्त, परम मनोहर और मंगलमय था। शत्रुनाशक राजा दुष्यन्त मन्त्री और पुरोहित सहित उसकी सीमा में प्रविष्ट हुआ।

Verse 70

इति श्रीमहाभारते आदिपर्वणि सम्भवपर्वणि शकुन्तलोपाख्याने सप्ततितमो< ध्याय:

इस प्रकार श्रीमहाभारत के आदिपर्व के सम्भवपर्व में शकुन्तलोपाख्यान का सत्तरवाँ अध्याय समाप्त हुआ।

Frequently Asked Questions

The central dharma-saṅkaṭa concerns intergenerational duty and sovereignty: whether sons should accept personal loss (taking a parent’s old age) to preserve dynastic stability and fulfill filial obligation.

The chapter frames desire (kāma) as intrinsically non-satiating and portrays ethical restraint and duty-based succession as stabilizing forces for both personal integrity and political order.

No explicit phalaśruti is stated here; the meta-function is archival and causal—establishing lineage legitimacy and illustrating how choices and transgressions generate long-term outcomes relevant to later Bhārata history.

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