Duḥṣantasya Vana-praveśaḥ
King Duḥṣanta’s Entry into the Forest Hunt
मीनभावमनुप्राप्ता बभूव यमुनाचरी । श्येनपादपरि भ्रष्ट तद् वीर्यमथ वासवम्,उन दोनोंके युद्ध करते समय वह वीर्य यमुनाजीके जलमें गिर पड़ा। अद्रिका नामसे विख्यात एक सुन्दरी अप्सरा ब्रह्माजीके शापसे मछली होकर वहीं यमुनाजीके जलमें रहती थी। बाजके पंजेसे छूटकर गिरे हुए वसुसम्बन्धी उस वीर्यको मत्स्यरूपधारिणी अद्विकाने वेगपूर्वक आकर निगल लिया। भरतश्रेष्ठ! तत्पश्चात् दसवाँ मास आनेपर मत्स्यजीवी मल्लाहोंने उस मछलीको जालमें बाँध लिया और उसके उदरको चीरकर एक कन्या और एक पुरुष निकाला
mīna-bhāvam anuprāptā babhūva yamunā-carī | śyena-pāda-pari-bhraṣṭaṃ tad vīryam atha vāsavam |
यमुना में रहने वाली वह अप्सरा शापवश मछली-भाव को प्राप्त हो गई थी। उसी समय श्येन के पंजे से छूटा हुआ वसु (इन्द्र)-सम्बन्धी वह वीर्य यमुना में गिरा।
वैशम्पायन उवाच