कुरुवंशप्रश्नः—दुःषन्तस्य राजधर्मवर्णनम्
Kuru Lineage Inquiry and the Portrait of King Duḥṣanta’s Rule
(यस्तु राजा शृूणोतीदमखिलाम श्लुते महीम् । प्रसूते गर्भिणी पुत्र॑ कन्या चाशु प्रदीयते ।। वणिज: सिद्धयात्रा: स्युर्वीरा विजयमाप्नुयु: । आस्तिकाउलूवसयेन्नित्यं ब्राह्यगाननसूयकान् ।। वेदविद्याव्रतस्नातान् क्षत्रियाउ्जयमास्थितान् । स्वधर्मनित्यान् वैश्यांश्व श्रावयेत् क्षत्रसंश्रितान् ।।) जो राजा इस महाभारतको सुनता है, वह सारी पृथ्वीके राज्यका उपभोग करता है। गर्भवती स्त्री इसका श्रवण करे तो वह पुत्रको जन्म देती है। कुमारी कन्या इसे सुने तो उसका शीघ्र विवाह हो जाता है। व्यापारी वैश्य यदि महाभारत श्रवण करें तो उनकी व्यापारके लिये की हुई यात्रा सफल होती है। शूरवीर सैनिक इसे सुननेसे युद्धमें विजय पाते हैं। जो आस्तिक और दोषदृष्टिसे रहित हों, उन ब्राह्मणोंको नित्य इसका श्रवण कराना चाहिये। वेद-विद्याका अध्ययन एवं ब्रह्मचर्यव्रत पूर्ण करके जो स्नातक हो चुके हैं, उन विजयी क्षत्रियोंको और क्षत्रियोंके अधीन रहनेवाले स्वधर्म-परायण वैश्योंको भी महाभारत श्रवण कराना चाहिये। (एष धर्म: पुरा दृष्ट: सर्वधर्मेषु भारत | ब्राह्मणाच्छुवणं राजन् विशेषेण विधीयते ।। भूयो वा य: पठेन्नित्यं स गच्छेत् परमां गतिम् । श्लोकं वाप्यनु गृह्नीत तथार्धश्लोकमेव वा ।। अपि पादं पठेन्नित्यं न च निर्भारतो भवेत् ।) भारत! सब धर्मोमें यह महाभारत-श्रवणरूप श्रेष्ठ धर्म पूर्वकालसे ही देखा गया है। राजन! विशेषतः ब्राह्मणके मुखसे इसे सुननेका विधान है। जो बारम्बार अथवा प्रतिदिन इसका पाठ करता है, वह परम गतिको प्राप्त होता है। प्रतिदिन चाहे एक श्लोक या आधे श्लोक अथवा श्लोकके एक चरणका ही पाठ कर ले, किंतु महाभारतके अध्ययनसे शून्य कभी नहीं रहना चाहिये। (इह नैकाश्रयं जन्म राजर्षीणां महात्मनाम् ।। इह मन्त्रपदं युक्त धर्म चानेकदर्शनम् । इह युद्धानि चित्राणि राज्ञां वृद्धिरिहैव च ।। ऋषीणां च कथास्तात इह गन्धर्वरक्षसाम् | इह तत् तत् समासाद्य विहितो वाक्यविस्तर: ।। तीर्थानां नाम पुण्यानां देशानां चेह कीर्तनम् । वनानां पर्वतानां च नदीनां सागरस्य च ।।) इस महाभारतमें महात्मा राजर्षियोंके विभिन्न प्रकारके जन्म-वृत्तान्तोंका वर्णन है। इसमें मन्त्र-पदोंका प्रयोग है। अनेक दृष्टियों (मतों)-के अनुसार धर्मके स्वरूपका विवेचन किया गया है। इस ग्रन्थमें विचित्र युद्धोंका वर्णन तथा राजाओंके अभ्युदयकी कथा है। तात! इस महाभारतमें ऋषियों तथा गन्धर्वों एवं राक्षसोंकी भी कथाएँ हैं। इसमें विभिन्न प्रसंगोंको लेकर विस्तारपूर्वक वाक्यरचना की गयी है। इसमें पुण्यतीर्थों, पवित्र देशों, वनों, पर्वतों, नदियों और समुद्रके भी माहात्म्यका प्रतिपादन किया गया है। (देशानां चैव पुण्यानां पुराणां चैव कीर्तनम् उपचारस्तथैवाग्रयो वीर्यमप्पतिमानुषम् ।। इह सत्कारयोगश्न भारते परमर्षिणा । रथाश्ववारणेन्द्राणां कल्पना युद्धकौशलम् ।। वाक्यजातिरनेका च सर्वमस्मिन् समर्पितम् ।) पुण्यप्रदेशों तथा नगरोंका भी वर्णन किया गया है। श्रेष्ठ उपचार और अलौकिक पराक्रमका भी वर्णन है। इस महाभारतमें महर्षि व्यासने सत्कार-योग (स्वागत-सत्कारके विविध प्रकार)-का निरूपण किया है तथा रथसेना, अश्वसेना और गजसेनाकी व्यूहरचना तथा युद्धकौशलका वर्णन किया है। इसमें अनेक शैलीकी वाक्ययोजना--कथोपकथनका समावेश हुआ है। सारांश यह कि इस ग्रन्थमें सभी विषयोंका वर्णन है। श्रावयेद् ब्राह्मणाञ्छाद्धे यश्चलेमं पादमन्ततः । अक्षय्यं तस्य तच्छाद्धमुपावर्तेत् पितृनिह,जो श्राद्ध करते समय अन्तमें ब्राह्मणोंको महाभारतके श्लोकका एक चतुर्थाश भी सुना देता है, उसका किया हुआ वह श्राद्ध अक्षय होकर पितरोंको अवश्य प्राप्त हो जाता है
vaiśampāyana uvāca |
yas tu rājā śṛṇotīdam akhilāṃ śrute mahīm |
prasūte garbhiṇī putraṃ kanyā cāśu pradīyate ||
vaṇijaḥ siddhayātrāḥ syur vīrā vijayam āpnuyuḥ |
āstikān ulūvasayen nityaṃ brāhya-gān anasūyakān |
vedavidyāvratasnātān kṣatriyān jayam āsthitān |
svadharmanityān vaiśyāṃś ca śrāvayet kṣatrasaṃśritān ||
जो राजा इस महाभारत का श्रवण करता है, वह समस्त पृथ्वी के राज्य का उपभोग करता है। गर्भवती स्त्री इसे सुने तो पुत्र को जन्म देती है और कुमारी कन्या सुने तो शीघ्र विवाह हो जाता है। व्यापारी की यात्रा सफल होती है और वीरों को युद्ध में विजय मिलती है। अतः आस्तिक और दोषदृष्टि से रहित ब्राह्मणों को नित्य इसका श्रवण कराना चाहिए; वेद-विद्या और व्रत पूर्ण कर स्नातक हुए, विजय में स्थित क्षत्रियों को तथा क्षत्रियों के आश्रित, स्वधर्म-परायण वैश्यों को भी इसका श्रवण कराना चाहिए।
वैशम्पायन उवाच