Janamejaya’s Request for Expansion; Vaiśampāyana’s Authorization and Phalāśruti of the Mahābhārata
Jaya
अन्यं वरय भद्रं ते वरं द्विजवरोत्तम । अयाचत न चाप्यन्यं वरं स भूगुनन्दन,उग्रश्रवाजी कहते हैं--भूगुनन्दन शौनक! आस्तीकके ऐसा कहनेपर उस समय वक्ताओंमें श्रेष्ठ राजा जनमेजयने उनसे बार-बार अनुरोध किया--'विप्रशिरोमणे! आपका कल्याण हो, कोई दूसरा वर माँगिये।' किंतु आस्तीकने दूसरा कोई वर नहीं माँगा
āstīka uvāca | anyaṃ varaya bhadraṃ te varaṃ dvijavarottama | ayācata na cāpy anyaṃ varaṃ sa bhṛgunandana ||
आस्तीक ने कहा—“हे द्विजवरोत्तम! आपका कल्याण हो, कोई दूसरा वर चुनिए।” पर भृगुनन्दन आस्तीक ने दूसरा कोई वर नहीं माँगा। वक्ताओं में श्रेष्ठ राजा जनमेजय ने बार-बार विनय करके कहा—“हे विप्रशिरोमणे! आपका कल्याण हो, कोई और वर माँगिए।” किंतु आस्तीक अपने एक ही संकल्प पर अडिग रहा।
आस्तीक उवाच