Janamejaya’s Request for Expansion; Vaiśampāyana’s Authorization and Phalāśruti of the Mahābhārata
Jaya
जनमेजय उवाच बालाभिरूपस्य तवाप्रमेय वरं प्रयच्छामि यथानुरूपम् । वृणीष्व यत् तेडभिमतं हृदि स्थितं तत् ते प्रदास्याम्पपि चेददेयम्,जनमेजयने कहा--ब्राह्मणबालक! तुम अप्रमेय हो--तुम्हारी प्रतिभाकी कोई सीमा नहीं है। मैं तुम-जैसे विद्वान्के लिये वर देना चाहता हूँ। तुम्हारे मनमें जो अभीष्ट कामना हो, उसे बताओ। वह देनेयोग्य न होगी, तो भी तुम्हें अवश्य दे दूँगा
janamejaya uvāca bālābhirūpasya tavāprameya varaṁ prayacchāmi yathānurūpam | vṛṇīṣva yat te ’bhimataṁ hṛdi sthitaṁ tat te pradāsyām api ced adeyam ||
जनमेजय ने कहा—ब्राह्मणबालक! तुम अप्रमेय हो; तुम्हारी श्रेष्ठता की कोई सीमा नहीं। मैं तुम्हारे अनुरूप वर देना चाहता हूँ। हृदय में जो अभीष्ट हो, उसे चुनो; जो सामान्यतः अदेय हो, वह भी मैं तुम्हें दे दूँगा।
जनमेजय उवाच