आदि पर्व — अध्याय ५५: पाण्डव-कौरववैरस्य संक्षेपवृत्तान्तः
Synopsis of the Pāṇḍava–Kaurava Estrangement
इमे च ते सूर्यसमानवर्चस: समासते वृत्रहण: क्रतुं यथा । नैषां ज्ञातुं विद्यते ज्ञानमद्य दत्तं येभ्यो न प्रणश्येत् कदाचित्,तुम्हारे ये ऋत्विज सूर्यके समान तेजस्वी हैं और इन्द्रके यज्ञकी भाँति तुम्हारे इस यज्ञका भलीभाँति अनुष्ठान करते हैं। कोई भी ऐसी जानने योग्य वस्तु नहीं है, जिसका इन्हें ज्ञान न हो। इन्हें दिया हुआ दान कभी नष्ट नहीं हो सकता
ime ca te sūryasamānavarcasaḥ samāsate vṛtrahaṇaḥ kratuṃ yathā | naiṣāṃ jñātuṃ vidyate jñānam adya dattaṃ yebhyo na praṇaśyet kadācit ||
आस्तीक ने कहा— तुम्हारे ये ऋत्विज सूर्य के समान तेजस्वी यहाँ बैठे हैं और इन्द्र के यज्ञ की भाँति तुम्हारे इस यज्ञ का विधिपूर्वक अनुष्ठान कर रहे हैं। जानने योग्य कोई भी वस्तु ऐसी नहीं, जो इनके ज्ञान से परे हो। ऐसे पुरुषों को दिया हुआ दान कभी नष्ट नहीं होता; वह स्थायी पुण्य बन जाता है।
आस्तीक उवाच