Āstīka-stuti at Janamejaya’s Sacrifice (आस्तीकस्तुतिः / यज्ञप्रशंसा)
प्रतिकर्तव्यमित्येवं येन मे हिंसित: पिता । शज्धिणं हेतुमात्रं यः कृत्वा दग्ध्वा च पार्थिवम्,जनमेजयने कहा--मन्त्रियो! मेरे पिताके स्वर्गलोकगमनके विषयमें आपलोगोंका यह वचन सुनकर मैंने अपनी बुद्धिद्वारा जो कर्तव्य निश्चित किया है, उसे आप सुन लें। मेरा विचार है, उस दुरात्मा तक्षकसे तुरंत बदला लेना चाहिये, जिसने शृंगी ऋषिको निमित्तमात्र बनाकर स्वयं ही मेरे पिता महाराजको अपनी विषाग्निसे दग्ध करके मारा है
pratikartavyam ity evaṁ yena me hiṁsitaḥ pitā | śṛṅgiṇaṁ hetumātraṁ yaḥ kṛtvā dagdhvā ca pārthivam ||
“जिसने मेरे पिता को हानि पहुँचाई है, उसके विरुद्ध प्रतिकार अवश्य होना चाहिए—उसने शृंगी ऋषि को केवल निमित्त बनाकर स्वयं ही उस पार्थिव को दग्ध करके मार डाला।”
जनमेजय उवाच