Āstīka-stuti at Janamejaya’s Sacrifice (आस्तीकस्तुतिः / यज्ञप्रशंसा)
यद् वृक्षं जीवयामास काश्यपस्तक्षकेण वै | नूनं मन्त्रहतविषो न प्रणश्येत काश्यपात्,जनमेजयने कहा--उस वृक्षके डँसे जाने और फिर हरे होनेकी बात आपलोगोंसे किसने कही? उस समय तक्षकके काटनेसे जो वृक्ष राखका ढेर बन गया था, उसे काश्यपने पुनः जिलाकर हरा-भरा कर दिया। यह सब लोगोंके लिये बड़े आश्वर्यकी बात है। यदि काश्यपके आ जानेसे उनके मन्त्रोंद्वारा तक्षकका विष नष्ट कर दिया जाता तो निश्चय ही मेरे पिताजी बच जाते
yad vṛkṣaṁ jīvayāmāsa kāśyapas takṣakeṇa vai | nūnaṁ mantrahataviṣo na praṇaśyet kāśyapāt ||
जनमेजय ने कहा—तक्षक के दंश से जो वृक्ष राख हो गया था, उसे काश्यप ने जीवित कर दिया; इससे स्पष्ट है कि काश्यप के मन्त्रों से तक्षक का विष निश्चय ही नष्ट हो सकता था। यदि वे समय पर पहुँच जाते, तो मेरे पिता का विनाश न होता।
जनमेजय उवाच