परिक्षिद्वृत्तान्तप्रश्नः
Inquiry into Parīkṣit’s Conduct and the Beginnings of His Downfall
वायुभक्षो निराहार: शुष्यन्नहरहर्मुनि: । स ददर्श पितृन् गर्ते लम्बमानानधोमुखान्,वे मुनि वायु पीते और निराहार रहते थे; इसलिये दिन-पर-दिन सूखते चले जाते थे। एक दिन उन्होंने पितरोंको देखा, जो नीचे मुँह किये एक गड्ढेमें लटक रहे थे। उन्होंने खश नामक तिनकोंके समूहको पकड़ रखा था, जिसकी जड़में केवल एक तन््तु बच गया था। उस बचे हुए तन्तुको भी वहीं बिलमें रहनेवाला एक चूहा धीरे-धीरे खा रहा था
vāyubhakṣo nirāhāraḥ śuṣyann ahar-ahar muneḥ | sa dadarśa pitṝn garte lambamānān adhomukhān |
वे मुनि वायु पीकर ही रहते और निराहार थे; इस कारण दिन-प्रतिदिन सूखते जाते थे। तब उन्होंने अपने पितरों को एक गड्ढे में नीचे मुँह लटके हुए देखा।
तक्षक उवाच