Jaratkāru’s Marital Compact and Departure (जरत्कारु–जरत्कारुणी संवादः)
फलदर्भोदकं गृह राज्ञे नागोडथ तक्षक: । उग्रश्रवाजी कहते हैं--शौनकजी! तब तक्षकने विचार किया, मुझे मायाका आश्रय लेकर राजाको ठग लेना चाहिये; किंतु इसके लिये क्या उपाय हो? तदनन्तर तक्षक नागने फल, दर्भ (कुशा) और जल लेकर कुछ नागोंको तपस्वीरूपमें राजाके पास जानेकी आज्ञा दी
उग्रश्रवा जी कहते हैं—“शौनक जी! तब तक्षक ने सोचा—माया का आश्रय लेकर राजा को ठगना चाहिए; पर उपाय क्या हो? फिर तक्षक नाग ने फल, दर्भ (कुश) और जल लेकर कुछ नागों को तपस्वी-रूप धारण कर राजा के पास जाने की आज्ञा दी।”
तक्षक उवाच