Jaratkāru’s Marital Compact and Departure (जरत्कारु–जरत्कारुणी संवादः)
विप्रशापाभिभूते च क्षीणायुषि नराधिपे । घटमानस्य ते विप्र सिद्धि: संशयिता भवेत्
विप्रवर! महाराज परीक्षित ब्राह्मण के शाप से अभिभूत हैं और उनकी आयु भी क्षीण हो चली है। ऐसी दशा में उन्हें बचाने के लिए प्रयत्न करने पर तुम्हें सिद्धि मिलेगी—इसमें संदेह है।
काश्यप उवाच