Jaradkāru Encounters the Pitṛs
Jaratkāru-Pitṛdarśana
शड्विंस्तव पिता सो5पि तथैवास्ते यतव्रत: । सो<पि राजा स्वनगरं प्रस्थितो गजसाह्दयम्,शंंगिन! संयमपूर्वक व्रतका पालन करनेवाले तुम्हारे पिता अभी उसी अवस्थामें बैठे हैं और वे राजा परीक्षित् अपनी राजधानी हस्तिनापुरको चले गये हैं
ṣaḍviṁśas tava pitā so 'pi tathaivāste yatavrataḥ | so 'pi rājā svanagaraṁ prasthito gajasāhṛdayam, śaṅgin |
तुम्हारे पिता—अब छब्बीसवें वर्ष में भी—उसी प्रकार संयमित व्रत में स्थिर बैठे हैं। और वह राजा भी, गज-हृदय के समान दृढ़, अपने नगर हस्तिनापुर को प्रस्थान कर गया है।
कृश उवाच