Jaradkāru Encounters the Pitṛs
Jaratkāru-Pitṛdarśana
क्षन्तव्यं पुत्र धर्मो हि हतो हन्ति न संशय: । यदि राजा न संरक्षेत् पीडा न: परमा भवेत्,शमीक बोले--वत्स! तुमने शाप देकर मेरा प्रिय कार्य नहीं किया है। यह तपस्वियोंका धर्म नहीं है। हमलोग उन महाराज परीक्षितके राज्यमें निवास करते हैं और उनके द्वारा न्यायपूर्वक हमारी रक्षा होती है। अतः उनको शाप देना मुझे पसंद नहीं है। हमारे-जैसे साधु पुरुषोंको तो वर्तमान राजा परीक्षितके अपराधको सब प्रकारसे क्षमा ही करना चाहिये। बेटा! यदि धर्मको नष्ट किया जाय तो वह मनुष्यका नाश कर देता है, इसमें संशय नहीं है। यदि राजा रक्षा न करे तो हमें भारी कष्ट पहुँच सकता है
kṣantavyaṃ putra dharmo hi hato hanti na saṃśayaḥ | yadi rājā na saṃrakṣet pīḍā naḥ paramā bhavet |
वत्स! क्षमा करना ही चाहिए; क्योंकि धर्म यदि आहत हो जाए तो वह अवश्य ही मार डालता है—इसमें संदेह नहीं। यदि राजा रक्षा न करे तो हमें अत्यन्त पीड़ा होगी।
शमीक उवाच