Ādi-parva Adhyāya 33: Vāsuki’s Council on Averting the Sarpa-satra
तयोरज्जे समाक्रम्य वैनतेयोन्तरिक्षग: । आच्छिनत् तरसा मध्ये सोममभ्यद्रवत् ततः,आकाशकमें विचरनेवाले महापराक्रमी विनता-कुमारने वेगपूर्वक आक्रमण करके उन दोनों सर्पोके शरीरको बीचसे काट डाला; फिर वे अमृतकी ओर झपटे और चक्रको तोड़- फोड़कर अमृतके पात्रको उठाकर बड़ी तेजीके साथ वहाँसे उड़ चले
tayor ajje samākramya vainateyo 'ntarikṣagaḥ | āchinat tarasā madhye somam abhyadravat tataḥ ||
आकाश में विचरने वाले महापराक्रमी विनता-नन्दन गरुड़ ने वेगपूर्वक धावा बोलकर उन दोनों सर्पों के शरीरों को बीच से काट डाला। तत्पश्चात् वह सोमरूप अमृत की ओर झपटा; रक्षक चक्र को चूर-चूर करके अमृत का पात्र उठा लिया और बड़ी तेजी से उस स्थान से उड़ गया।
शौनक उवाच