Nāga-prādhānya-nāma-kathana
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ते5थ रोषसमाविष्टा: सुभृश॑ जातमन्यव: । आरेभिरे महत् कर्म तदा शक्रभयंकरम्,इन्द्रके इस व्यवहारसे वालखिल्य मुनियोंकों बड़ा रोष हुआ। उनके हृदयमें भारी क्रोधका उदय हो गया। अतः उन्होंने उस समय एक ऐसे महान् कर्मका आरम्भ किया, जिसका परिणाम इन्द्रके लिये भयंकर था
te 'tha roṣa-samāviṣṭāḥ subhṛśaṁ jāta-manyavaḥ | ārebhire mahat karma tadā śakra-bhayaṅkaram ||
तब वालखिल्य मुनि रोष से भर उठे; उनके हृदय में प्रचण्ड क्रोध जाग उठा। उसी समय उन्होंने एक महान कर्म (यज्ञकृत्य) का आरम्भ किया, जिसका परिणाम शक्र (इन्द्र) के लिए भयङ्कर होने वाला था।
शौनक उवाच