अपने-आप बछ। अर: - यह विष्णुवाहन गरुडसे भिन्न था। (मयदर्शनपर्व) सप्तविशत्यधिकद्धिशततमो< ध्याय: देवताओंकी पराजय, खाण्डववनका विनाश और मयासुरकी रक्षा वैशम्पायन उवाच तथा शैलनिपातेन भीषिता: खाण्डवालया: । दानवा राक्षसा नागास्तरक्ष्वृक्षवनौकस:,वैशम्पायनजी कहते हैं--जनमेजय! इस प्रकार पर्वतशिखरके गिरनेसे खाण्डववनमें रहनेवाले दानव, राक्षस, नाग, चीते तथा रीछ आदि वनचर प्राणी भयभीत हो उठे
vaiśampāyana uvāca | tathā śailanipātena bhīṣitāḥ khāṇḍavālayāḥ | dānavā rākṣasā nāgās tarakṣvṛkṣavanaukasaḥ ||
वैशम्पायन बोले—जनमेजय! इस प्रकार पर्वत-शिखरों के गिरने से खाण्डववन में रहने वाले दानव, राक्षस, नाग तथा चीते-रीछ आदि वनचर प्राणी भयभीत हो उठे।
वैशम्पायन उवाच