Raivataka-giri Mahotsava and the Counsel on Subhadrā’s Marriage (रैवतके महोत्सवः — सुभद्राविवाहोपायविचारः)
अन्त:पुरवनोयद्याने पर्वतेषु वनेषु च । यथेप्सितेषु देशेषु विजह्ाातेडमराविव,अन्तःपुरके उपवन और उद्यानमें, पर्वतोंपर, वनोंमें तथा अन्य मनोवांछित प्रदेशोंमें भी वे देवताओंकी भाँति विहार करने लगे
antaḥpuravanodyāne parvateṣu vaneṣu ca | yathepsiteṣu deśeṣu vijahrāte ’marāv iva ||
अन्तःपुर के उपवन-उद्यानों में, पर्वतों पर, वनों में और मनोवांछित अन्य प्रदेशों में भी वे देवताओं की भाँति विहार करने लगे।
नारद उवाच