अर्जुनस्य तीर्थयात्रा तथा मणलूर-सम्बन्धः
Arjuna’s Pilgrimage and the Maṇalūra Alliance
प्रादाद् युधिष्ठिरो धीमान् राज्यं तस्मै न््यवेदयत् । प्रतिगृहा तु तां पूजामृषि: प्रीतमनास्तदा,उन्हें आया देख राजा युधिष्ठिरने आगे बढ़कर उन्हें प्रणाम किया और अपना परम सुन्दर आसन उन्हें बैठनेके लिये दिया। जब देवर्षि उसपर बैठ गये, तब परम बुद्धिमान् युधिष्ठिरने स्वयं ही विधिपूर्वक उन्हें अर्घ्य निवेदन किया और उसीके साथ-साथ उन्हें अपना राज्य समर्पित कर दिया। उनकी यह पूजा ग्रहण करके देवर्षि उस समय मन-ही-मन बड़े प्रसन्न हुए
vaiśampāyana uvāca | prādād yudhiṣṭhiro dhīmān rājyaṃ tasmai nyavedayat | pratigṛhya tu tāṃ pūjām ṛṣiḥ prītamanās tadā ||
बुद्धिमान् युधिष्ठिर ने उन्हें यथोचित सम्मान दिया और औपचारिक रूप से अपना राज्य भी उन्हें समर्पित कर दिया। उस पूजा को स्वीकार करके ऋषि उस समय मन-ही-मन प्रसन्न हुए।
वैशम्पायन उवाच