खाण्डवप्रस्थप्रवेशः तथा इन्द्रप्रस्थनिर्माणवर्णनम् | Entry into Khāṇḍavaprastha and Description of Indraprastha’s Founding
ततः प्रीतमना: क्षत्ता धृतराष्ट्र विशाम्पते । उवाच दिष्टया कुरवो वर्धन्त इति विस्मित:,विदुरजीने जब यह सुना कि पाण्डवोंने द्रौपदीको प्राप्त किया है और धृतराष्ट्रके पुत्र अपना अभिमान चूर्ण हो जानेसे लज्जित होकर लौट आये हैं, तब वे मन-ही-मन बड़े प्रसन्न हुए। राजन! तब वे धृतराष्ट्रके पास जाकर विस्मयसूचक वाणीमें बोले--“महाराज! हमारा अहोभाग्य है, जो कौरववंशकी वृद्धि हो रही है
tataḥ prītamanāḥ kṣattā dhṛtarāṣṭra viśāmpate | uvāca diṣṭyā kuravo vardhanta iti vismitaḥ ||
तब प्रसन्नचित्त क्षत्ता विदुर, हे प्रजापते धृतराष्ट्र, विस्मय के साथ बोले—“महाराज! सौभाग्य से कुरुजन बढ़ रहे हैं।”
वैशम्पायन उवाच