
कर्णस्य मन्त्रः — Duryodhana-प्रति नीति-विचारः (Karna’s Counsel on Strategy toward the Pāṇḍavas)
Upa-parva: Mantra–Nīti Saṃvāda (Karna’s Counsel on Policy and Force)
Karna addresses Duryodhana with a critical assessment of earlier failures to restrain the Pāṇḍavas when they were politically and militarily immature. He argues that the Pāṇḍavas are now consolidated: they are vigilant, motivated to reclaim ancestral status, and internally cohesive—particularly through their shared marriage to Kṛṣṇā (Draupadī), which he presents as resistant to external attempts at sowing discord. He further notes the reliability of allied support from Pañcāla (Drupada and his capable son), asserting that such allies will not abandon the Pāṇḍavas even for inducements. Karna concludes that sāma, dāna, and bheda are ineffective and urges immediate decisive action (vikrama/daṇḍa) while the Kaurava side retains relative advantage and before additional support (including Kṛṣṇa and Yādava forces) arrives. The narration then shifts to Vaiśaṃpāyana, who reports Dhṛtarāṣṭra’s approval of Karna’s martial confidence and his decision to summon Bhīṣma, Droṇa, Vidura, and other ministers for formal consultation.
Chapter Arc: द्रुपद राजा युधिष्ठिर को बुलाकर अत्यन्त विनय से पूछता है—ये पाँचों वीर वास्तव में कौन हैं: क्षत्रिय, ब्राह्मण, वैश्य, शूद्र, या किसी मायावी वेश में आए हुए? → पाण्डवों की पहचान गुप्त है; द्रुपद का भय है कि कहीं नियम-विरुद्ध सम्बन्ध न हो जाए। युधिष्ठिर सत्य और मर्यादा के बीच संतुलन रखते हुए द्रुपद को आश्वस्त करता है कि विवाह विधिपूर्वक और धर्मानुसार ही होगा, और द्रुपद को संशय न रखने का उपदेश देता है। → युधिष्ठिर का निर्णायक वचन—‘यह अटल धर्म है; बिना शंका के इसका पालन कीजिए’—द्रुपद के भीतर उठते संदेह को काट देता है; उसी क्षण कथा में एक दिव्य-गुरुत्व का प्रवेश-आभास बनता है। → सभा में सब मिलकर विवाह-विषयक बातों का निष्कर्ष करते हैं; द्रुपद हर्ष से भर उठता है, पर युधिष्ठिर की गंभीरता और धर्म-निश्चय के सामने वह कुछ क्षण बोल भी नहीं पाता। → उसी समय यदृच्छया महर्षि द्वैपायन (व्यास) का आगमन होता है—उनके आने से गुप्त पहचान, विवाह-धर्म और भविष्य की दिशा पर निर्णायक प्रकाश पड़ने वाला है।
Verse 1
अ-क्राछ चतुन॑वर्त्याधेकशततमो< ध्याय: ट्रपद और युधिष्ठिरकी बातचीत तथा व्यासजीका आगमन वैशम्पायन उवाच तत आहूय पाज्चाल्यो राजपुत्र युधिष्ठिरम् । परिग्रहेण ब्राह्मण परिगृह महाद्युति:
वैशम्पायन बोले—तदनन्तर पाञ्चालराज द्रुपद ने राजकुमार युधिष्ठिर को बुलाया। महातेजस्वी राजा ने ब्राह्मणोचित आतिथ्य-सत्कार से उनका परिग्रह करके पूछा।
Verse 2
पर्यपृच्छददीनात्मा कुन्तीपुत्रं सुवर्चसम् । कथं जानीम भवतः: क्षत्रियान् ब्राह्मणानुत
उदारचित्त राजा ने तेजस्वी कुन्तीपुत्र से पूछा—हम कैसे जानें कि आप क्षत्रिय हैं या ब्राह्मण?
Verse 3
वैश्यान् वा गुणसम्पन्नानथवा शूद्रयोनिजान् । मायामास्थाय वा वि्रांश्वरत: सर्वतोदिशम्
क्या आप गुणसम्पन्न वैश्य हैं अथवा शूद्र-योनि में जन्मे हैं? या फिर माया का आश्रय लेकर ब्राह्मण-वेष धारण किए सब दिशाओं में विचरते हैं?
Verse 4
कृष्णाहेतोरनुप्राप्ता देवा: संदर्शनार्थिन: । ब्रवीतु नो भवान् सत्य संदेहो हृत्र नो महान्
वैशम्पायन बोले—ये निश्चय ही देवता हैं, जो कृष्ण के दर्शन के लिए यहाँ आए हैं। हे महोदय, हमें सत्य बताइए; क्योंकि आपके विषय में हमारे हृदय में बड़ा संदेह उत्पन्न हो गया है।
Verse 5
अपि न: संशयस्यान्ते मन: संतुष्टिमावहेत् । अपि नो भागधेयानि शुभानि स्यु: परंतप,परंतप! आपसे रहस्यकी बात सुनकर क्या हमारे इस संशयका नाश और मनको संतोष होगा और क्या हमारा भाग्य उदय होगा?
हे परंतप! क्या इस गूढ़ रहस्य को सुनकर हमारे संशय का अंत होगा और मन को संतोष मिलेगा? और क्या हमारा शुभ भाग्य तथा हमारा उचित भाग वास्तव में उदय होगा?
Verse 6
इच्छया ब्रूहि तत् सत्यं सत्यं राजसु शोभते । इष्टापूर्तेन च तथा वक्तव्यमनृतं न तु
आप स्वेच्छा से सत्य बात कहिए। राजाओं में सत्य ही शोभा है, वही उनका भूषण है। यज्ञ और लोक-कल्याण के कर्म प्रशंसित हों, तो भी असत्य नहीं बोलना चाहिए—सत्य ही कहना चाहिए।
Verse 7
श्रुत्वा हमरसंकाश तव वाक्यमरिंदम । ध्रुवं विवाहकरणमास्थास्यामि विधानत:,देवताओंके समान तेजस्वी शत्रुसूदन! मैं आपकी बात सुनकर निश्चय ही विधिपूर्वक विवाहकी तैयारी करूँगा
वैशम्पायन बोले—हे देवतुल्य तेजस्वी, हे शत्रुसूदन! आपकी बात सुनकर मैं निश्चय ही विधि के अनुसार विवाह की तैयारी करूँगा।
Verse 8
युधिछिर उवाच मा राजन् विमना भूस्त्वं पाज्चाल्य प्रीतिरस्तु ते । ईप्सितस्ते ध्रुव: काम: संवृत्तोडयमसंशयम्
युधिष्ठिर बोले—हे पांचालराज! आप उदास न हों; आपको प्रसन्न होना चाहिए। आपके मन की अभीष्ट कामना निश्चय ही आज पूर्ण हुई है—इसमें कोई संदेह नहीं।
Verse 9
वयं हि क्षत्रिया राजन् पाण्डो: पुत्रा महात्मन: । ज्येष्ठ मां विद्धि कौन्तेयं भीमसेनार्जुनाविमौ
राजन्, हम निश्चय ही क्षत्रिय हैं—महात्मा पाण्डु के पुत्र। मुझे कुन्ती का ज्येष्ठ पुत्र जानिए; और ये दोनों भीमसेन तथा अर्जुन हैं।
Verse 10
आशभ्यां तव सुता राजन् निर्जिता राजसंसदि । यमौ च तत्र कुन्ती च यत्र कृष्णा व्यवस्थिता
राजन्, राजसभा में आपकी पुत्री इन्हीं दोनों के द्वारा जीती गई है। वहाँ यमज नकुल-सहदेव भी हैं; और माता कुन्ती भी वहीं गई हैं जहाँ राजकुमारी कृष्णा (द्रौपदी) ठहरी है।
Verse 11
व्येतु ते मानसं दुःखं क्षत्रिया: स्मो नरर्षभ | पद्मिनीव सुतेयं ते हृदादन्यद्वदं गता
नरश्रेष्ठ, आपके मन का दुःख दूर हो जाए। हम सब क्षत्रिय हैं। आपकी यह पुत्री, कमलिनी की भाँति, एक सरोवर से दूसरे सरोवर को चली गई है—आपके हृदय से दूसरे के हृदय में।
Verse 12
इति तथ्यं महाराज सर्वमेतद् ब्रवीमि ते | भवान् हि गुरुरस्माकं परमं च परायणम्,महाराज! यह सब मैं आपसे सच्ची बात कह रहा हूँ। आप हमारे बड़े तथा परम आश्रय हैं
महाराज, यह सब मैं आपसे सत्य ही कह रहा हूँ। आप हमारे गुरु हैं और हमारे परम आश्रय तथा अंतिम सहारा हैं।
Verse 13
वैशम्पायन उवाच ततः स द्रुपदो राजा हर्षव्याकुललोचन: । प्रतिवक्तुं मुदा युक्तो नाशकत् तं॑ युधिषछ्िरम्
वैशम्पायन बोले—तब राजा द्रुपद की आँखें हर्ष से व्याकुल हो उठीं। वे आनंदपूर्वक उत्तर देना चाहते थे, पर भावावेश के कारण तत्काल युधिष्ठिर को उत्तर न दे सके।
Verse 14
यत्नेन तु स तं हर्ष संनिगृहा परंतप: । अनुरूपं तदा वाचा प्रत्युवाच युधिष्ठिरम्,शत्रुसूदन ट्रपदने (बड़े) यत्नसे अपने (हर्षके आवेश)-को रोका और युधिष्ठिरको उनके कथनके अनुरूप ही उत्तर दिया
परंतप शत्रुसूदन ने उस समय हर्ष के वेग को बड़े यत्न से रोककर, जो कहा गया था उसके अनुरूप ही युधिष्ठिर को उचित वचन में उत्तर दिया।
Verse 15
पप्रच्छ चैनं धर्मात्मा यथा ते प्रद्रुता: पुरात् । स तस्मै सर्वमाचख्यावानुपूर्व्येण पाण्डव:
तब धर्मात्मा पांचाल-राज ने उससे पूछा—“तुम लोग पहले वारणावत से कैसे निकल भागे?” तब पाण्डव युधिष्ठिर ने उसे वह सब वृत्तांत क्रमशः कह सुनाया।
Verse 16
तच्छुत्वा द्रुपदो राजा कुन्तीपुत्रस्य भाषितम् । विगर्हयमास तदा धृतराष्ट्रं नरेश्वरम्
कुन्तीपुत्र के मुख से वह समाचार सुनकर राजा द्रुपद ने उसी समय नरेश्वर धृतराष्ट्र की कठोर निन्दा की।
Verse 17
आश्वासयामास च त॑ कुन्तीपुत्रं युधिष्ठिरम् । प्रतिजज्ञे च राज्याय द्रुपदो वदतां वर:
वक्ताओं में श्रेष्ठ द्रुपद ने कुन्तीपुत्र युधिष्ठिर को ढाढ़स बँधाया और राज्य के विषय में दृढ़ प्रतिज्ञा की।
Verse 18
ततः कुन्ती च कृष्णा च भीमसेनार्जुनावपि । यमौ च राज्ञा संदिष्टं विविशुर्भवनं महत्
तत्पश्चात् कुन्ती और कृष्णा, भीमसेन और अर्जुन तथा दोनों यमज (नकुल-सहदेव) भी राजा द्वारा निर्दिष्ट विशाल भवन में प्रविष्ट हुए।
Verse 19
तत्र ते न््यवसन् राजन् यज्ञसेनेन पूजिता: । प्रत्याश्वस्तस्ततो राजा सह पुत्रैरुवाच तम्
वहाँ, राजन्, वे यज्ञसेन (द्रुपद) द्वारा सत्कृत होकर उसी विशाल भवन में रहने लगे। तब राजा द्रुपद आश्वस्त होकर अपने पुत्रों के साथ युधिष्ठिर के पास गया और उससे बोला।
Verse 20
गृह्नातु विधिवत् पाणिमद्यायं कुरुनन्दन: । पुण्येडहनि महाबाहुरर्जुन: कुरुतां क्षणम्
कुरुकुल को आनन्दित करने वाले महाबाहु अर्जुन आज के इस पुण्य दिवस में विधिपूर्वक मेरी पुत्री का पाणिग्रहण करें और बिना विलम्ब अपने कुलोचित मंगलाचार आरम्भ करें।
Verse 21
वैशम्पायन उवाच तमब्रवीत् ततो राजा धर्मात्मा च युधिष्ठिर: । ममापि दारसम्बन्ध: कार्यस्तावद् विशाम्पते,वैशम्पायनजी कहते हैं--तब धर्मात्मा राजा युधिष्ठिरने उनसे कहा --'राजन! विवाह तो मेरा भी करना होगा”
वैशम्पायन बोले—तब धर्मात्मा राजा युधिष्ठिर ने उनसे कहा—“राजन्, विवाह का बन्धन तो मुझे भी यथाकाल करना होगा।”
Verse 22
दुपद उवाच भवान् वा विधिवत पार्णिं गृह्नातु दुहितुर्मम । यस्य वा मन्यसे वीर तस्य कृष्णामुपादिश
द्रुपद बोले—“वीर! आप ही विधिपूर्वक मेरी पुत्री का पाणिग्रहण करें; अथवा अपने भाइयों में से जिसे उचित समझें, उसी के लिए कृष्णा का विवाह निश्चित कर दें।”
Verse 23
युधिछिर उवाच सर्वेषां महिषी राजन् द्रौपदी नो भविष्यति । एवं प्रव्याह्वतं पूर्व मम मात्रा विशाम्पते
युधिष्ठिर बोले—“राजन्, द्रौपदी हम सबकी पटरानी होगी। हे प्रजापते, मेरी माता ने पहले ही ऐसा आदेश दे रखा है।”
Verse 24
अहं चाप्यनिविष्टो वै भीमसेनश्न् पाण्डव: । पार्थेन विजिता चैषा रत्नभूता सुता तव,मैं तथा पाण्डव भीमसेन भी अभीतक अविवाहित हैं और आपकी इस रत्नस्वरूपा कन्याको अर्जुनने जीता है
युधिष्ठिर बोले— मैं भी अभी अविवाहित हूँ और पाण्डव भीमसेन भी अभी तक अविवाहित है। और आपकी यह रत्नस्वरूपा कन्या पार्थ (अर्जुन) द्वारा जीती गई है।
Verse 25
एष न: समयो राजन् रत्नस्यथ सह भोजनम् | न च तं हातुमिच्छाम: समयं राजसत्तम
युधिष्ठिर बोले— महाराज! रत्न के विषय में हमारी यह शर्त ठहरी है कि हम सब उसे बाँटकर एक साथ उपभोग करेंगे। और राजश्रेष्ठ! हम उस प्रतिज्ञा को छोड़ना या तोड़ना नहीं चाहते।
Verse 26
सर्वेषां धर्मतः कृष्णा महिषी नो भविष्यति । आनुपूर्व्येण सर्वेषां गृह्नातु ज्वलने करान्,अतः कृष्णा धर्मके अनुसार हम सभीकी महारानी होगी। इसलिये वह प्रज्वलित अग्निके सामने क्रमश: हम सबका पाणिग्रहण करे
युधिष्ठिर बोले— धर्म के अनुसार कृष्णा हम सबकी महारानी होगी। अतः प्रज्वलित अग्नि के सामने वह क्रमशः हम सबका पाणिग्रहण करे।
Verse 27
दुपद उवाच एकस्य बह्दयो विहिता महिष्य: कुरुनन्दन । नैकस्या बहव: पुंस: श्रूयन्ते पतय: क्वचित्
द्रुपद बोले— कुरुनन्दन! एक पुरुष की बहुत-सी रानियाँ हों— ऐसा विधान तो वेदों में देखा गया है; पर एक स्त्री के अनेक पति हों, ऐसा कहीं सुनने में नहीं आया।
Verse 28
लोकवेददविरुद्ध त्वं नाधर्म धर्मविच्छुचि: । कर्तुमहसि कौन्तेय कस्मात् ते बुद्धिरीदृशी
द्रुपद बोले— तुम धर्म के ज्ञाता और पवित्र हो; इसलिए लोक और वेद के विरुद्ध यह अधर्म तुम्हें नहीं करना चाहिए। कौन्तेय! तुम्हारी बुद्धि ऐसी क्यों हो रही है?
Verse 29
युधिछिर उवाच सूक्ष्मो धर्मो महाराज नास्य विद्यो वयं गतिम् । पूर्वेषामानुपूर्व्येण यातं वर्त्मनुयामहे
युधिष्ठिर ने कहा—महाराज! धर्म का स्वरूप अत्यन्त सूक्ष्म है; हम उसकी गति को यथार्थतः नहीं जानते। इसलिए पूर्वजों ने जिस मार्ग से क्रमशः गमन किया है, हम उसी पथ का अनुसरण करते हैं।
Verse 30
न मे वागनृतं प्राह नाधर्मे धीयते मति: । एवं चैव वदत्यम्बा मम चैतन्मनोगतम्
युधिष्ठिर ने कहा—मेरी वाणी ने कभी असत्य नहीं कहा और मेरी बुद्धि कभी अधर्म की ओर नहीं झुकी। हमारी माता भी यही कहती हैं, और मेरे मन को भी यही उचित प्रतीत होता है।
Verse 31
एष धर्मों ध्रुवो राजंश्वरैनमविचारयम् । मा च शंका तत्र ते स्थात् कथंचिदपि पार्थिव
युधिष्ठिर ने कहा—राजन्! यह धर्म अटल है; आप बिना डगमगाए, अधिक विचार-विमर्श किए बिना, इसका पालन करें। हे पृथ्वीपते! इस विषय में आपके मन में किसी प्रकार का संदेह न उठे।
Verse 32
दुपद उवाच त्वंच कुन्ती च कौन्तेय धृष्टद्युम्नश्व मे सुतः । कथयन्त्विति कर्तव्यं श्व:ः काले करवामहे
द्रुपद ने कहा—कुन्तीनन्दन! तुम, कुन्तीदेवी और मेरा पुत्र धृष्टद्युम्न—तुम सब मिलकर यह निश्चित करके बताओ कि क्या करना चाहिए; वही हम लोग कल उचित समय पर करेंगे।
Verse 33
वैशग्पायन उवाच ते समेत्य तत: सर्वे कथयन्ति सम भारत । अथ द्वैपायनो राजन्नभ्यागच्छद् यदृच्छया
वैशम्पायन ने कहा—हे भारत! तत्पश्चात वे सब लोग एकत्र होकर उस विषय में परामर्श करने लगे। राजन्! उसी समय द्वैपायन वेदव्यास मानो संयोगवश वहाँ अकस्मात् आ पहुँचे।
Verse 193
इस प्रकार श्रीमह्याभारत आदिपर्वके अन्तर्गत वैवाहिकपर्वनें युधिष्ठिर आदिकी परीक्षाविषयक एक सौ तिरानबेवाँ अध्याय पूरा हुआ
इस प्रकार श्रीमहाभारत के आदिपर्व के अंतर्गत वैवाहिकपर्व में युधिष्ठिर आदि की परीक्षा-विषयक एक सौ तिरानबेवाँ अध्याय समाप्त हुआ। कथावाचक ने औपचारिक संक्रमण का संकेत देते हुए यह प्रतिपादित किया कि ये घटनाएँ चरित्र और आचरण की सुव्यवस्थित परीक्षा के रूप में विन्यस्त हैं।
Verse 194
इति श्रीमहाभारते आदिपर्वणि वैवाहिकपर्वणि द्वैपायनागमने चतुर्नवत्यधिकशततमो<ध्याय:
इति श्रीमहाभारत के आदिपर्व के वैवाहिकपर्व में द्वैपायन (व्यास) के आगमन-विषयक एक सौ चौरानबेवाँ अध्याय समाप्त हुआ।
The dilemma concerns means and legitimacy in governance: whether a ruler should rely on conciliatory policy tools or shift to coercive action when rivals are cohesive, allied, and perceived as politically unreconcilable.
The chapter illustrates a pragmatic rājānīti claim: strategy depends on timing, coalition strength, and opponent cohesion; however, it also implicitly foregrounds the ethical risk of treating coercion as the default solution when other instruments are judged ineffective.
No explicit phalaśruti is stated here; the meta-commentary appears structurally through the narrative shift to Dhṛtarāṣṭra’s convening of elders, signaling that consequential decisions require broader deliberation within the epic’s moral-political framework.
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