यस्त्वेष वृक्ष तरसावभज्य राज्ञां निकारे सहसा प्रवृत्त: । वृकोदरान्नान्य इहैतदद्य कर्तु समर्थ: समरे पृथिव्याम्,'भैया संकर्षण! ये जो श्रेष्ठ सिंहके समान चालसे लीलापूर्वक चल रहे हैं और तालके- बराबर विशाल धनुषको खींच रहे हैं, ये अर्जुन ही हैं; इसमें विचार करनेकी कोई बात नहीं है। यदि मैं वासुदेव हूँ तो मेरी यह बात झूठी नहीं है और ये जो बड़े वेगसे वृक्ष उखाड़कर सहसा समस्त राजाओंका सामना करनेके लिये उद्यत हुए हैं, भीमसेन हैं; क्योंकि इस समय पृथ्वीपर भीमसेनके सिवा दूसरा कोई ऐसा वीर नहीं है, जो युद्ध-भूमिमें यह अद्भुत पराक्रम कर सके
vaiśampāyana uvāca | yastveṣa vṛkṣaṁ tarasāvabhajya rājñāṁ nikāre sahasā pravṛttaḥ | vṛkodarānnānya ihaitad adya kartuṁ samarthaḥ samare pṛthivyām ||
और जो यह पुरुष वेग से वृक्ष को उखाड़कर राजाओं की भीड़ पर सहसा टूट पड़ा है—आज इस पृथ्वी पर युद्ध में ऐसा अद्भुत कर्म करने में वृकोदर (भीम) के सिवा कोई समर्थ नहीं।
वैशम्पायन उवाच
The verse highlights discernment of true capability: extraordinary deeds in a crisis reveal a hero’s distinctive nature, and praise is grounded in observable action rather than mere claim.
The narrator identifies the warrior who has uprooted a tree and rushed to face a gathered host of kings as Bhīma (Vṛkodara), asserting that no one else on earth at that moment could perform such a feat in battle.