द्रौपदी-प्राप्तिः, कुन्त्याः वाक्यप्रमादः, भ्रातृ-एक्यनिर्णयः
Draupadī’s Arrival, Kuntī’s Unintended Utterance, and the Decision for Fraternal Unity
ते समाशंसिरे लब्धां श्रियं राज्यं च पाण्डवा: । ब्राह्मणं तै पुरस्कृत्य पाज्चालीं च स्वयंवरे,पाण्डवोंने उन ब्राह्मणदेवताको पुरोहित बनाकर यह भलीभाँति विश्वास कर लिया कि “हमें अपना राज्य और धन अब मिले हुएके ही समान है।” साथ ही उन्हें यह भी भरोसा हो गया कि 'स्वयंवरमें द्रौपदी हमें मिल जायगी”
te samāśaṃsire labdhāṃ śriyaṃ rājyaṃ ca pāṇḍavāḥ | brāhmaṇaṃ taiḥ puraskṛtya pāñcālīṃ ca svayaṃvare ||
वैशम्पायन बोले—पाण्डवों ने यह दृढ़ निश्चय कर लिया कि लक्ष्मी और अपना राज्य मानो उन्हें मिल ही गया है। उन्होंने एक ब्राह्मण को अग्रणी और मार्गदर्शक बनाकर यह भी निश्चय किया कि स्वयंवर में पाञ्चाली (द्रौपदी) भी उन्हें ही प्राप्त होगी।
वैशम्पायन उवाच