Ādi Parva, Adhyāya 180 — Svayaṃvara-Virodha and Pāṇḍava Parākrama
Draupadī Episode
यो हि कारणत:ः क्रोध॑ संजातं क्षन्तुमर्हति । नालं स मनुज: सम्यक् त्रिवर्ग परिरक्षितुम्,जो किसी कारणवश उत्पन्न हुए क्रोधको सह लेता है, वह मनुष्य धर्म, अर्थ और कामकी रक्षा करनेमें समर्थ नहीं होता ततो वृद्धांश्व बालांश्व राक्षसान् स महामुनि: । ददाह वितते यज्ञे शक्तेव॑ंधमनुस्मरन् उस विस्तृत यज्ञमें अपने पिता शक्तिके वधका बार-बार चिन्तन करते हुए महामुनि पराशरने राक्षसजातिके बूढ़ों तथा बालकोंको भी जलाना आरम्भ किया
Aurva uvāca | yo hi kāraṇataḥ krodhaṃ sañjātaṃ kṣantum arhati | nālaṃ sa manuṣyaḥ samyak trivargaṃ parirakṣitum || tato vṛddhāṃś ca bālāṃś ca rākṣasān sa mahāmuniḥ | dadāha vitate yajñe śakteḥ vadham anusmaran ||
और्व ने कहा— “जो मनुष्य किसी कारण से उत्पन्न हुए क्रोध को सह लेता है, वह धर्म, अर्थ और काम—इन त्रिवर्गों की सम्यक् रक्षा करने में समर्थ नहीं होता।” तत्पश्चात् विस्तृत यज्ञ में, अपने पिता शक्ति-वध का बार-बार स्मरण करते हुए, महामुनि पराशर ने राक्षसों को—बूढ़ों और बालकों तक को—दग्ध करना आरम्भ किया।
ऑर्व उवाच