Ādi Parva, Adhyāya 180 — Svayaṃvara-Virodha and Pāṇḍava Parākrama
Draupadī Episode
अत एषामहं क़ुद्धो लोकानामी श्वरो हाहम् । भवतां च वचो नालमहं समभिवर्तितुम्,इस लोकमें अपना जीवन सबको प्रिय है, यह समझकर सबका शासन करनेवाले राजालोग सामर्थ्य होते हुए भी मेरे पिताओंकी रक्षा न कर सके, इसीलिये मैं भी इन सब लोकोंपर कुपित हुआ हूँ। मुझमें इन्हें दण्ड देनेकी शक्ति है। अतः (इस विषयमें) मैं आपलोगोंका वचन माननेमें असमर्थ हूँ शम एव परो धर्मस्तमाचर पराशर । अधर्मिष्ठ वरिष्ठ: सन् कुरुषे त्वं पराशर “पराशर! शान्त रहना ही (ब्राह्मणोंका) श्रेष्ठ धर्म है, अतः उसीका आचरण करो। तुम श्रेष्ठ ब्राह्मण होकर भी यह पापकर्म करते हो?
ata eṣām ahaṃ kruddho lokānām īśvaro hāham | bhavatāṃ ca vaco nālam ahaṃ samabhivartitum || śama eva paro dharmas tam ācara parāśara | adharmiṣṭha variṣṭhaḥ san kuruṣe tvaṃ parāśara ||
और्व ने कहा— इसी कारण मैं इन लोकों पर क्रुद्ध हूँ—हाय! मैं, जो इनका स्वामी हूँ। मैं आपके वचन का पालन करने में समर्थ नहीं हूँ। (वृद्धों ने कहा)—पराशर! शम (संयम) ही परम धर्म है; उसी का आचरण करो। तुम श्रेष्ठ ब्राह्मण होकर भी यह अधर्म क्यों करते हो?
ऑर्व उवाच