Amṛta-Pāna, Rāhu’s Detection, and the Sudarśana Intervention (अमृतपान-राहुप्रकाशन-सुदर्शनप्रयोगः)
देवैरसुरसड्घैश्व मथ्यतां कलशोदधि: । भविष्यत्यमृतं तत्र मथ्यमाने महोदधौ,उसके शुभ एवं उच्चतम शृंग असंख्य चमकीले रत्नोंसे व्याप्त हैं। वे अपनी विशालताके कारण आकाशके समान अनन्त जान पड़ते हैं। समस्त महातेजस्वी देवता मेरुगिरिके उस महान् शिखरपर चढ़कर एक स्थानमें बैठ गये और सब मिलकर अमृत- प्राप्तिके लिये क्या उपाय किया जाय, इसका विचार करने लगे। वे सभी तपस्वी तथा शौच- संतोष आदि नियमोंसे संयुक्त थे। इस प्रकार परस्पर विचार एवं सबके साथ मन्त्रणामें लगे हुए देवताओंके समुदायमें उपस्थित हो भगवान् नारायणने ब्रह्माजीसे यों कहा--“समस्त देवता और असुर मिलकर महासागरका मन्थन करें। उस महासागरका मन्न्थन आरम्भ होनेपर उसमेंसे अमृत प्रकट होगा
śaunaka uvāca | devair asurasaṅghaiś ca mathyatāṁ kalaśodadhiḥ | bhaviṣyaty amṛtaṁ tatra mathyamāne mahodadhau ||
शौनक ने कहा—देवता और असुरों के समुदाय मिलकर कलश-समुद्र (महासागर) का मन्थन करें। उस विशाल समुद्र के मथने पर उसमें से अमृत प्रकट होगा।
शौनक उवाच