Vasiṣṭhasya śokaḥ, Vipāśā–Śatadrū-nāmākaraṇam, Kalmāṣapādasya bhaya-prasaṅgaḥ (Ādi Parva 167)
राज्युवाच अवलिपत॑ मुखं ब्रह्मन् दिव्यान् गन्धान् बिभर्मि च । सुतार्थे नोपलब्धास्मि तिष्ठ याज मम प्रिये,रानी बोली--ब्रह्मन! अभी मेरे मुखमें ताम्बूल आदिका रंग लगा है! मैं अपने अंगोंमें दिव्य सुगन्धित अंगराग धारण कर रही हूँ, अतः मुँह धोये और स्नान किये बिना पुत्रदायक हविष्यका स्पर्श करनेके योग्य नहीं हूँ, इसलिये याजजी! मेरे इस प्रिय कार्यके लिये थोड़ी देर ठहर जाइये
rājñy uvāca—avaliptaṁ mukhaṁ brahman divyān gandhān bibharmi ca | sutārthe nopalabdhāsmi tiṣṭha yāja mama priye ||
रानी बोली— “ब्रह्मन्! मेरे मुख में अभी ताम्बूल आदि का रंग लगा है और मैं दिव्य सुगन्धित अंगराग धारण किए हूँ। पुत्र-प्राप्ति के लिए मैं अभी हविष्य स्पर्श करने योग्य शुद्ध अवस्था में नहीं हूँ; इसलिए हे याज! मेरे इस प्रिय कर्म के लिए थोड़ी देर ठहर जाइए।”
ब्राह्मण उवाच