आर्जुन–गन्धर्वसंवादः
Arjuna–Gandharva Dialogue on Honor, Night-Power, and Purohita-Nīti
अवश्यकरणीये च मा त्वां कालो5त्यगादयम् | कि त्वत: परम॑ दुःखं यद् वयं स्वर्गते त्वयि,“पिताजी! जो काम अवश्य करना है, उसका निश्चय करनेमें आपको अपना समय व्यर्थ नहीं जाने देना चाहिये (शीघ्र मेरा त्याग करके इस कुलकी रक्षा करनी चाहिये)। हमलोगोंके लिये इससे बढ़कर महान् दुःख और क्या होगा कि आपके स्वर्गवासी हो जानेपर हम दूसरोंसे अन्नकी भीख माँगते हुए कुत्तोंकी तरह इधर-उधर दौड़ते फिरें। यदि मुझे त्यागककर आप अपने भाई-बन्धुओंसहित इस क्लेशसे मुक्त हो नीरोग बने रहें तो मैं अमरलोकमें निवास करती हुई बहुत सुखी होऊँगी
vaiśampāyana uvāca | avaśyakaraṇīye ca mā tvāṁ kālo 'tyagād ayam | kiṁ tvataḥ paramaṁ duḥkhaṁ yad vayaṁ svargate tvayi ||
और जो कार्य अवश्य करने योग्य है, उसमें यह समय तुम्हें न लाँघ जाए। तुम्हारे स्वर्गवासी हो जाने पर हम जो दूसरों से अन्न माँगते हुए कुत्तों की भाँति इधर-उधर भटकें—हमारे लिये इससे बढ़कर दुःख और क्या होगा?
वैशम्पायन उवाच