Hiḍimba’s Approach and Hiḍimbā’s Warning to Bhīmasena (हिडिम्बागमनम् / हिडिम्बा-भयवचनम्)
दया न तस्मिन् कर्तव्या शरणागत इत्युत । निरुद्धिग्नो हि भवति नहताज्जायते भयम्,“यह मेरी शरणमें आया है, यह सोचकर उसके प्रति दया नहीं दिखानी चाहिये। शत्रुको मार देनेसे ही राजा निर्भय हो सकता है। यदि शत्रु मारा नहीं गया तो उससे सदा ही भय बना रहता है
dayā na tasmin kartavyā śaraṇāgata ity uta | niruddhigno hi bhavati nihatāj jāyate bhayam ||
वैशम्पायन बोले—केवल यह कहकर कि ‘यह शरण में आया है’, उसके प्रति दया नहीं करनी चाहिए। शत्रु के मारे जाने पर ही राजा निश्चिन्त और निर्भय होता है; यदि शत्रु न मारा जाए, तो भय फिर-फिर उत्पन्न होता रहता है।
वैशम्पायन उवाच