Vāraṇāvata-prasaṃsā and the Pāṇḍavas’ Departure (वरणावत-प्रशंसा तथा पाण्डव-प्रयाणम्)
एकरात्र तु ते ब्रह्मन् काम॑ दास्यामि भोजनम् | एवमुक्तस्त्वहं तेन सदार: प्रस्थितस्तदा,“ब्रह्मन! तुम्हारी इच्छा हो तो मैं तुम्हें एक रातके लिये अच्छी तरह भोजन दे सकता ' राजा ट्रुपदके यों कहनेपर मैं पत्नी और पुत्रके साथ वहाँसे चल दिया
ekarātraṃ tu te brahman kāmaṃ dāsyāmi bhojanam | evam uktas tv ahaṃ tena sadāraḥ prasthitas tadā |
वैशम्पायन बोले— “हे ब्राह्मण, तुम्हारी इच्छा हो तो मैं तुम्हें एक रात का भोजन दे दूँगा।” राजा द्रुपद के ऐसा कहने पर मैं तब पत्नी और पुत्र सहित वहाँ से चल पड़ा—आतिथि-धर्म के अनुसार उस आतिथ्य को स्वीकार करके।
वैशम्पायन उवाच