Droṇa’s Ācārya-Dakṣiṇā: Capture of Drupada and Division of Pāñcāla (द्रोण-आचार्यदक्षिणा)
शतमेकोत्तरं तेषां कुमाराणां महौजसाम् | एक एव निगृह्नाति नातिकृच्छाद् वृकोदर:,राजन! हर्षसे खेल-कूदमें लगे हुए उन कौरवोंको पकड़कर भीमसेन कहीं छिप जाते थे। कभी उनके सिर पकड़कर पाण्डवोंसे लड़ा देते थे। धृतराष्ट्रके एक सौ एक कुमार बड़े बलवान थे; किंतु भीमसेन बिना अधिक कष्ट उठाये अकेले ही उन सबको अपने वशमें कर लेते थे। बलवान् भीम उनके बाल पकड़कर बलपूर्वक उन्हें एक-दूसरेसे टकरा देते और उनके चीखने-चिल्लानेपर भी उन्हें धरतीपर घसीटते रहते थे। उस समय उनके घुटने, मस्तक और कंधे छिल जाया करते थे
śatam ekottaraṃ teṣāṃ kumārāṇāṃ mahaujasām | eka eva nigṛhṇāti nātikṛcchād vṛkodaraḥ ||
वैशम्पायन बोले—राजन्! उन महाबली कुमारों की संख्या एक सौ एक थी; परन्तु वृकोदर भीम अकेला ही बिना अधिक परिश्रम के उन सबको वश में कर लेता था।
वैशम्पायन उवाच