आदि पर्व (अध्याय १२७) — रङ्गे कर्णस्य अवमानः, दुर्योधनस्य प्रतिपक्ष-निवृत्तिः, मैत्री-स्थापनम् / Ādi Parva (Chapter 127) — Karṇa’s Public Humiliation, Duryodhana’s Intervention, and the Formation of Alliance
(हयमेधाग्निना सर्वे याजका: सपुरोहिता: । वेदोक्तेन विधानेन क्रियाश्चक्रु: समन्त्रकम् ।।) याजकैरभ्यनुज्ञाते प्रेतकर्मण्यनुछिते । घृतावसिक्त राजानं सह माद्र्या स्वलंकृतम्,समस्त याजकों और पुरोहितोंने अश्वमेधकी अग्निसे वेदोक्त विधिके अनुसार मन्त्रोच्चारणपूर्वक सारी क्रियाएँ सम्पन्न कीं। याजकोंकी आज्ञा लेकर प्रेतकर्म आरम्भ करते समय माद्रीसहित अलंकारयुक्त राजाका घृतसे अभिषेक किया गया
hayamedhāgninā sarve yājakāḥ sapurohitāḥ | vedoktena vidhānena kriyāś cakruḥ samantrakam || yājakair abhyanujñāte pretakarmaṇy anucite | ghṛtāvasiktaṃ rājānaṃ saha mādryā svalakṛtam ||
समस्त याजकों ने पुरोहितों सहित अश्वमेध की अग्नि से वेदोक्त विधि के अनुसार मन्त्रों के साथ सब क्रियाएँ सम्पन्न कीं। फिर याजकों की अनुमति लेकर, प्रेतकर्म आरम्भ होने पर, अलंकारों से विभूषित राजा का माद्री सहित घृताभिषेक किया गया।
वैशम्पायन उवाच