Adhyāya 125: Raṅga-pradarśana — Arjuna’s Entry and Astric Demonstration (रङ्गप्रदर्शनम्)
तस्मान्मे सुतयो: कुन्ति वर्तितव्यं स्वपुत्रवत् मां च कामयमानो<यं राजा प्रेतवशं गत:,अतः आप ही जीवित रहकर मेरे पुत्रोंका भी अपने पुत्रोंके समान ही पालन कीजियेगा। इसके सिवा ये महाराज मेरी ही कामना रखकर मृत्युके अधीन हुए हैं
tasmān me sutayoḥ kunti vartitavyaṃ svaputravat māṃ ca kāmayamāno 'yaṃ rājā pretavaśaṃ gataḥ | ataḥ tvam eva jīvitvā mama putrāṇām api svaputrāṇām iva pālanaṃ kariṣyasi | etad anyat—eṣa mahārājo mamaiva kāmanāṃ kṛtvā mṛtyuvaśaṃ gataḥ ||
अतः, हे कुन्ती, तुम मेरे पुत्रों का भी अपने पुत्रों के समान पालन करना। यह राजा मेरी ही कामना करते हुए मृत्यु के वश में चला गया; इसलिए तुम जीवित रहकर मेरे पुत्रों का भी वैसे ही योग-क्षेम का निर्वाह करना जैसे अपने पुत्रों का।
वैशम्पायन उवाच