कृपकृपी-जननम्
The Birth of Kṛpa and Kṛpī; Kṛpa’s Attainment of Astras
अपत्यं धर्मफलदं श्रेष्ठ विन्दन्ति मानवा: । आत्मशुक्रादपि पृथे मनु: स्वायम्भुवोडब्रवीत्,'पृथे! अपने वीर्यके बिना भी मनुष्य किसी श्रेष्ठ पुरुषके सम्बन्धसे श्रेष्ठ पुत्र प्राप्त कर लेते हैं और वह धर्मका फल देनेवाला होता है, यह बात स्वायम्भुव मनुने कही है
“पृथे! मनुष्य अपने ही वीर्य के बिना भी किसी श्रेष्ठ पुरुष के सम्बन्ध से श्रेष्ठ संतान प्राप्त कर लेते हैं, और वह संतान धर्म का फल देनेवाली होती है”—यह बात स्वायम्भुव मनु ने कही है।
वैशम्पायन उवाच