कृपकृपी-जननम्
The Birth of Kṛpa and Kṛpī; Kṛpa’s Attainment of Astras
स्वयंजात: प्रणीतश्न तत्सम: पुत्रिकासुत: । पौनर्भवश्ल कानीन: भगिन्यां यश्ष॒ जायते,“पहला पुत्र वह है, जो विवाहिता पत्नीसे अपने द्वारा उत्पन्न किया गया हो; उसे 'स्वयंजात' कहते हैं। दूसरा प्रणीत कहलाता है, जो अपनी ही पत्नीके गर्भसे किसी उत्तम पुरुषके अनुग्रहसे उत्पन्न होता है। तीसरा जो अपनी पुत्रीका पुत्र हो, वह भी उसके ही समान माना गया है। चौथे प्रकारके पुत्रकी पौनर्भवः संज्ञा है, जो दूसरी बार ब्याही हुई सत्रीसे उत्पन्न हुआ हो। पाँचवें प्रकारके पुत्रकी कानीन संज्ञा है (विवाहसे पहले ही जिस कन्याको इस शर्तके साथ दिया जाता है कि इसके गर्भसे उत्पन्न होनेवाला पुत्र मेरा पुत्र समझा जायगा उस कन्याके पुत्रको “कानीन' कहते हैं)5। जो बहनका पुत्र (भानजा) है, वह छठा कहा गया है
svayaṃjātaḥ praṇītaś ca tat-samaḥ putrikā-sutaḥ | paunarbhavaś ca kānīno bhaginyāṃ yaś ca jāyate ||
वैशम्पायन बोले— जो पुत्र अपनी विधिवत् विवाहिता पत्नी से स्वयं उत्पन्न किया गया हो, वह ‘स्वयंजात’ कहलाता है। जो अपनी पत्नी के गर्भ में किसी श्रेष्ठ पुरुष के नियोग/अनुग्रह से उत्पन्न हो, वह ‘प्रणीत’ कहा जाता है। पुत्रिका का पुत्र (पुत्री का पुत्र) भी उसके समान माना गया है। पुनर्विवाहिता स्त्री से उत्पन्न पुत्र ‘पौनर्भव’ कहलाता है। कन्या से (निश्चित व्यवस्था के अनुसार) उत्पन्न पुत्र ‘कानीन’ कहा जाता है। और बहन से उत्पन्न पुत्र—अर्थात् भानजा—भी इनमें गिना गया है।
वैशम्पायन उवाच