Pāṇḍu’s Marriages, Conquests, and Triumphal Return (पाण्डोर्विवाह-विजय-प्रत्यागमनम्)
उक्त भवत्या यच्छेयस्तन्महां रोचते भृशम् । वैशम्पायनजी कहते हैं--महर्षि व्यासका नाम लेते ही भीष्मजी हाथ जोड़कर बोले--“माताजी! जो मनुष्य धर्म, अर्थ और काम--इन तीनोंका बारंबार विचार करता है तथा यह भी जानता है कि किस प्रकार अर्थसे अर्थ, धर्मसे धर्म और कामसे कामरूप फलकी प्राप्ति होती है और वह परिणाममें कैसे सुखद होता है तथा किस प्रकार अर्थादिके सेवनसे विपरीत फल (अर्थनाश आदि) प्रकट होते हैं, इन बातोंपर पृथक्ू-पृथक् भलीभाँति विचार करके जो धीर पुरुष अपनी बुद्धिके द्वारा कर्तव्याकर्तव्यका निर्णय करता है, वही बुद्धिमान है। तुमने जो बात कही है, वह धर्मयुक्त तो है ही, हमारे कुलके लिये भी हितकर और कल्याणकारी है; इसलिये मुझे बहुत अच्छी लगी है”
uktaṁ bhavatyā yac chreyas tan mahān roc̣ate bhṛśam |
वैशम्पायन बोले—“आपने जो श्रेय का मार्ग कहा है, वह मुझे अत्यन्त रुचिकर है।”
वैशम्पायन उवाच