Pāṇḍu’s Marriages, Conquests, and Triumphal Return (पाण्डोर्विवाह-विजय-प्रत्यागमनम्)
यो व्यस्य वेदांश्षतुरस्तपसा भगवानृषि: । लोके व्यासत्वमापेदे कार्ष्ण्यात् कृष्णत्वमेव च,“वे भगवान् द्वैपायन मुनि अपने तपोबलसे चारों वेदोंका पृथक्ू-पृथक् विस्तार करके लोकमें “व्यास” पदवीको प्राप्त हुए हैं। शरीरका रंग साँवला होनेसे उन्हें लोग “कृष्ण” भी कहते हैं
yo vyasya vedāṁś caturas tapasa bhagavān ṛṣiḥ | loke vyāsatvam āpede kārṣṇyāt kṛṣṇatvam eva ca ||
वैशम्पायन बोले—वे भगवान् ऋषि अपने तप से चारों वेदों को पृथक्-पृथक् रूप में विभक्त करके विस्तृत कर गए; इसलिए लोक में उन्हें “व्यास” की पदवी मिली। और श्याम वर्ण होने से लोग उन्हें “कृष्ण” भी कहते हैं।
वैशम्पायन उवाच