अनुक्रमणिकाध्यायः (Anukramaṇikā Adhyāya) — Invocation, Narrator Frame, and Textual Scope
ब्रह्मोवाच तपोविशिष्टादपि वै विशिष्टान्मुनिसंचयात् । मन्ये श्रेष्ठतरं त्वां वै रहस्यज्ञानवेदनात्,ब्रह्माजीने कहा--व्यासजी! संसारमें विशिष्ट तपस्या और विशिष्ट कुलके कारण जितने भी श्रेष्ठ ऋषि-मुनि हैं, उनमें मैं तुम्हें सर्वश्रेष्ठ समझता हूँ; क्योंकि तुम जगत्, जीव और ईश्वर-तत्त्वका जो ज्ञान है, उसके ज्ञाता हो
brahmovāca tapoviśiṣṭād api vai viśiṣṭān munisaṃcayāt | manye śreṣṭhataraṃ tvāṃ vai rahasyajñānavedanāt ||
ब्रह्माजी बोले— हे व्यास! तपस्या और कुल-वैशिष्ट्य से विभूषित जितने भी श्रेष्ठ ऋषि-मुनि यहाँ एकत्र हैं, उन सबमें मैं तुम्हें ही सर्वोत्तम मानता हूँ; क्योंकि तुम जगत्, जीव और ईश्वर-तत्त्व के उस गूढ़ रहस्य-ज्ञान के ज्ञाता हो।