अनुक्रमणिकाध्यायः (Anukramaṇikā Adhyāya) — Invocation, Narrator Frame, and Textual Scope
चातुर्व्ण्यविधानं च पुराणानां च कृत्स्नश: । तपसो ब्रह्मचर्यस्य पृथिव्याश्रन्द्रसूर्ययो:,ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र--इन चारों वर्णोंके कर्तव्यका विधान, पुराणोंका सम्पूर्ण मूलतत्त्व भी प्रकट हुआ है। तपस्या एवं ब्रह्मचर्यके स्वरूप, अनुष्ठान एवं फलोंका विवरण, पृथ्वी, चन्द्रमा, सूर्य, ग्रह, नक्षत्र, तारा, सत्ययुग, त्रेता, द्वापर, कलियुग--इन सबके परिमाण और प्रमाण, ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद और इनके आध्यात्मिक अभिप्राय और अध्यात्मशास्त्रका इस ग्रन्थमें विस्तारसे वर्णन किया गया है
cāturvarṇyavidhānaṃ ca purāṇānāṃ ca kṛtsnaśaḥ | tapaso brahmacaryasya pṛthivyāś candra-sūryayoḥ ||
इस ग्रन्थ में ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र—इन चारों वर्णों के कर्तव्यों का विधान तथा पुराणों का सम्पूर्ण तत्त्व प्रकट किया गया है। तपस्या और ब्रह्मचर्य के स्वरूप, साधन और फल, तथा पृथ्वी, चन्द्र और सूर्य आदि के मान-प्रमाण का भी यहाँ विस्तार से वर्णन है।