अनुक्रमणिकाध्यायः (Anukramaṇikā Adhyāya) — Invocation, Narrator Frame, and Textual Scope
यक्षा: साध्या: पिशाचाश्च गुह्मका: पितरस्तथा । ततः प्रसूता विद्वांस: शिष्टा ब्रद्यूर्षिसत्तमा:,तदनन्तर यक्ष, साध्य, पिशाच, गुहाक और पितर एवं तत्त्वज्ञानी सदाचारपरायण साधुशिरोमणि ब्रह्मर्षिगण प्रकट हुए
yakṣāḥ sādhyāḥ piśācāś ca guhyakāḥ pitaras tathā | tataḥ prasūtā vidvāṁsaḥ śiṣṭā brahmarṣisattamāḥ ||
तदनन्तर यक्ष, साध्य और पिशाच; तथा गुह्यक और पितर प्रकट हुए। उनके पश्चात् तत्त्वज्ञ, शिष्टाचार-परायण, ब्रह्मर्षियों में श्रेष्ठ महर्षि उत्पन्न हुए—जिनकी शोभा ज्ञान और धर्मनिष्ठा से थी।